स्थायी शिक्षकों से ही उच्च शिक्षा में होगा गुणवत्तापूर्ण सुधार

बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था, जो कभी नालंदा और विक्रमशिला जैसी महान संस्थाओं का गढ़ थी, लंबे समय से उपेक्षा का शिकार रही है. सत्रों का विलंब, प्राध्यापकों की कमी और जर्जर बुनियादी ढांचा इसकी पहचान बन गए थे. हाल के वर्षों में, राज्य सरकार ने उच्च शिक्षा में सुधार की दिशा में कई कदम उठाए हैं, लेकिन इन सुधारों की असलियत क्या है, यह एक बड़ा सवाल है. पढ़ें , डॉ अरमान आनंद का आलेख-

नालंदा और विक्रमशिला जैसे वैश्विक ज्ञान केंद्रों की गौरवशाली विरासत को संजोये बिहार का आधुनिक उच्च शिक्षा तंत्र लंबे समय से अपनी पहचान खोता नजर आ रहा था. सत्रों का अत्यधिक विलंब होना, प्राध्यापकों का घोर अभाव और जर्जर बुनियादी ढांचा, राज्य के उच्च शिक्षा तंत्र की नियति बन चुके थे. हालांकि, हाल के वर्षों में राज्य शिक्षा विभाग और लोकभवन के संयुक्त प्रयासों ने विश्वविद्यालयों के कायाकल्प की एक नयी उम्मीद जगायी है.

शिक्षा विभाग से पूर्णतः पृथक उच्च शिक्षा विभाग का गठन और राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का क्रियान्वयन शासन की प्रशासनिक दृढ़ता दर्शाता है. पर बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ये सुधार केवल सरकारी फाइलों और ऑनलाइन पोर्टलों तक सीमित हैं या वाकई कक्षाओं और प्रयोगशालाओं में कोई बदलाव आ रहा है? नीतिगत स्तर पर सरकार के प्रयास निःसंदेह दूरदर्शी हैं.

पारंपरिक तीन वर्षीय स्नातक के स्थान पर चार वर्षीय विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली लागू और आठवें सेमेस्टर में शोध प्रबंध अनिवार्य करना छात्रों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम है. साथ ही, 31 दिसंबर, 2026 तक सभी राज्य विश्वविद्यालयों को 'समर्थ पोर्टल' पर लाकर पूर्ण डिजिटल गवर्नेंस का लक्ष्य तय करना प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का ठोस प्रयास है.

नामांकन से लेकर परीक्षा परिणाम और शिक्षकों की उपस्थिति तक को ऑनलाइन करना, प्रमाण है कि राज्य अब लचर प्रशासनिक रवैये से बाहर निकलना चाहता है. इस पूरे सुधार कार्यक्रम का सबसे सुंदर और प्रभावी पहलू दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों और अकादमिक रूप से पिछड़े अनुमंडलों में नये डिग्री कॉलेजों की स्थापना है.

इस कारण सकल नामांकन अनुपात में तो वृद्धि हुई ही है, राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के जुड़ाव से छात्राओं के नामांकन में भी अप्रत्याशित उछाल आया है. पर चिंता का विषय यह है कि अधिकांश महाविद्यालयों में प्राचार्य पद के लिए वरिष्ठ प्राध्यापकों, शैक्षणिक पद के लिए सहायक प्राध्यापकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों का अभाव है. संसाधनों की कमी झेलते सरकारी मध्य विद्यालयों अथवा उच्च विद्यालयों का आनन-फानन में चयन कर महाविद्यालय आरंभ करने की जल्दबाजी के बजाय क्रमबद्ध रूप से मिशन मोड में काम करने की जरूरत है.

पूर्व से चल रहे महाविद्यालयों में भी छात्र-शिक्षक अनुपात को दुरुस्त करने की आवश्यकता है. किसी भी व्यवस्थागत सुधार की सफलता शिक्षण संस्थानों की धरातलीय क्षमता से तय होती है. बिहार के वर्तमान शैक्षिक सुधार ‘ऊपर से नीचे की ओर’ थोपे जा रहे हैं, जबकि सच्चाई ‘नीचे से ऊपर की ओर’ बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने की मांग करती है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम लागू तो कर दिया गया, पर बिहार के अधिकांश अंगीभूत और संबद्ध महाविद्यालयों में न तो आधुनिक प्रयोगशालाएं हैं, न ही शोध पत्रिकाओं से लैस पुस्तकालय. वर्षों से प्रयोगशाला सहायकों की नियुक्तियां थमी हुई हैं. ऐसे में, आठवें सेमेस्टर के छात्रों के लिए रिसर्च प्रोजेक्ट को अनिवार्य बनाना शोध की गुणवत्ता को 'कट-कॉपी-पेस्ट' की संस्कृति में धकेलने जैसा है. चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम का मूल सिद्धांत छात्रों को अपनी पसंद के विषय चुनने की आजादी देना है.

पर जब कॉलेजों में वैकल्पिक विषयों को पढ़ाने के लिए शिक्षक ही नहीं होंगे, तो यह 'चॉइस' केवल कागजों पर रह जायेगी. उच्च शिक्षा सुधार में सबसे कमजोर कड़ी मानव संसाधन है. बिहार के विश्वविद्यालय लंबे समय से 'अतिथि शिक्षकों' के भरोसे सांस ले रहे हैं. नियमित प्राध्यापकों की कमी से वर्तमान शिक्षकों पर कक्षाओं, परीक्षाओं, मूल्यांकन और प्रशासनिक कार्यों का इतना बोझ है कि वे चाहकर भी शोध या नवाचार पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं.

जब तक छात्र-शिक्षक अनुपात राष्ट्रीय मानक (30:1) के करीब नहीं पहुंचता, तब तक सतत आंतरिक मूल्यांकन एक प्रशासनिक औपचारिकता बनी रहेगी. यही स्थिति डिजिटल गवर्नेंस की भी है. तृतीय और चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों को बिना व्यापक तकनीकी प्रशिक्षण दिये अचानक 26 डिजिटल मॉड्यूल सौंप देने से काम में गति आने के बजाय गतिरोध पैदा हो रहा है.

वहीं कठोर समय सीमा के दबाव में तैयार किये जा रहे 'पांच वर्षीय विजन डॉक्यूमेंट' और बिना बुनियादी सुधारों के नैक मूल्यांकन के लिए आवेदन करने की जल्दबाजी संस्थानों को खराब ग्रेडिंग की ओर धकेल रही है. हाल में बिहार सरकार ने नये निजी विश्वविद्यालयों को मान्यता दी है. इसका स्वागत होना चाहिए, पर इनमें से कोई भी भारत या विश्व स्तर के नहीं हैं. यदि निजी विश्वविद्यालयों पर उच्च शिक्षा विभाग कड़ी निगरानी नहीं रख पाया, तब ये कहीं डिग्री बांटने वाले केंद्र बन कर न रह जायें.

बिहार सरकार और उच्च शिक्षा विभाग का इरादा नेक है और नीतियां महत्वाकांक्षी हैं, पर बुनियादी ढांचे को सुधारे बिना इन्हें लागू करना ‘बिना नींव के महल बनाने’ जैसा है. यदि राज्य को अपनी खोई हुई शैक्षणिक प्रतिष्ठा वापस पानी है, तो सरकार और राजभवन को आपसी समन्वय के साथ सबसे पहले शिक्षकों की स्थायी बहाली, प्रयोगशालाओं के आधुनिकीकरण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के डिजिटल प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित करना होगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)


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By डॉ अरमान आनंद

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