महामारी से बड़ा मुकाबला

लोगों द्वारा गैर जिम्मेदार ढंग से व्यवहार करते हुए देखना दुखद है. सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है. सामाजिक दूरी बरतना एकमात्र वैसा असरदार उपाय है, जो इस वायरस को बढ़ने से रोक सकता है.

By लेखा रतनानी | March 23, 2020 7:10 AM

लेखा रतनानी

संपादक, बिलियन प्रेस

lekha@thebillionpress.org

बीते सप्ताह की शुरुआत में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे द्वारा घोषित महाराष्ट्र सरकार का यह निर्णय कि वैसे सभी कोरोना पीड़ितों के शरीर पर मुहर लगायी जायेगी, जो अपने घरों में एकांतवास (क्वारेंटाइन) कर रहे हैं और इस घोषणा पर व्यक्त प्रतिक्रियाएं किसी महामारी से लड़ाई की जटिलता उजागर करती हैं. वर्ष 1897 में ‘महामारी बीमारियां अधिनियम’ को पारित और लागू किये जाने पर समाज के विभिन्न वर्गों को नाराजगी हुई थी. तत्कालीन बॉम्बे राज्य में ब्यूबोनिक प्लेग के प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए आज से 123 वर्ष पहले इस अधिनियम के प्रावधान विभिन्न स्तरों की सख्ती के साथ लागू किये गये थे. तब स्वयं बाल गंगाधार तिलक ने इस अधिनियम और ब्रिटिश शासकों के सख्त तौर-तरीकों की आलोचना की थी.

विदित हो कि वर्ष 1896 में मुंबई में प्लेग की बीमारी बड़ी तेजी से फैली और हजारों जिंदगियां लील गयी, जिनमें मुख्यतः झुग्गी-झोपड़ियों में रहनेवाली आबादी शामिल थी. यह इन्हीं मौतों का नतीजा था कि वर्ष 1891 की जनगणना के मुताबिक जहां बॉम्बे की आबादी 8 लाख 20 हजार थी, वहीं वर्ष 1901 की जनगणना में वह घट कर 7 लाख 80 हजार ही रह गयी.

बॉम्बे राज्य के तत्कालीन गवर्नर लॉर्ड सैंडहर्स्ट ने भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड एल्गिन को एक तार भेज कर इस महामारी की सूचना दी, जिसके प्रत्युत्तर में केंद्र ने इस अधिनियम को पारित कर दिया. उसके बाद से, जब-तब स्वाइन फ्लू, हैजा और डेंगू जैसी विभिन्न महामारियों का प्रकोप बढ़ने पर सरकारों द्वारा इस अधिनियम के प्रावधानों को लागू किया जाता रहा है. इस वर्ष 11 मार्च को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कोरोना वायरस के प्रकोप को वैश्विक महामारी घोषित किये जाने के बाद भारत ने एक बार फिर इस अधिनियम का सहारा लिया है.

पिछले दिनों देशभर के कई शहरों में 31 मार्च तक के लिए स्कूल, कॉलेज, सिनेमा हॉल, मॉल, जिम आदि बंद करने के निर्देश दिये गये हैं. साथ ही प्रधानमंत्री द्वारा विशेष रूप से एहतियात बरतने की अपील की गयी है.

इसके अलावा कई राज्य सरकारें अपने स्तर पर इस महामारी को रोकने के लिए कड़े कदम उठा रही हैं. लोगों को मंदिर, मस्जिद, चर्च और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर जाने से मना किया गया है. इस तरह, चेतावनियां जारी करने और शहर को चालू रखे जाने के बीच एक बारीक रेखा होती है, जो किसी भी शासन द्वारा खींची ही जाती है.

महाराष्ट्र में मरीज के बदन पर मुहर लगाने का फैसला किया गया है. यह सामाजिक दूरी बरतने (डिस्टेंसिंग) को सामाजिक बहिष्कार में बदल कर ऐसी छवि पैदा कर देना है कि वायरस जीत रहा है और लोग हार रहे हैं. इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि महाराष्ट्र में कोरोना के सबसे ज्यादा मरीज मिले हैं. इसलिए, इसमें कोई हैरत नहीं कि महामारी अधिनियम के प्रावधानों को लागू कर इस वायरस को रोकने हेतु कड़े कदम उठानेवाला यह भारत का पहला राज्य बन गया है.

मशहूर मेडिकल विशेषज्ञ डॉ देवी शेट्टी को यह कहते हुए बताया गया है कि ‘केंद्र वैसा हर कार्य कर रहा है, जो वह कर सकता है. लेकिन, लोगों द्वारा गैरजिम्मेदार ढंग से व्यवहार करते हुए देखना दुखद ही है. सहयोग बहुत महत्वपूर्ण है. सामाजिक दूरी बरतना एकमात्र वैसा असरदार उपाय है, जो इस वायरस को बढ़ने से रोक सकता है. पर हम आज भी लोगों को यात्राएं करते हुए देख रहे हैं और सड़कों पर भीड़भरी आवाजाही बदस्तूर जारी है. इसे रुकना ही चाहिए.’

इतिहास हमें यह बताता है कि भारत की इस व्यापारिक राजधानी तक दौलत पहुंचानेवाले व्यापारिक जहाज ही यहां पर मौत भी लाये. हालांकि, समृद्ध व्यापारीगण उससे बचे नहीं रहे, पर यह सत्य है कि उसके मुख्य शिकार गरीब ही हुए. 1890 के दशक में रोजगार की खोज में बाहर से इस शहर में आनेवाली आबादी के आधे से भी अधिक लोग झुग्गियों और ‘चालों’ में रहते थे, जो बहुत संकरी और अस्वच्छ हुआ करती थीं. कमाल की चीज यह है कि जो स्थिति तब थी, वही आज भी मौजूद है और ऐसे में इस बार भी मृत्युदर भयानक हो सकती है.

महामारी अधिनियम 1897 में केवल चार धाराएं हैं और इसे भारत के सबसे छोटे अधिनियमों में से एक माना जाता है. यह सरकार को इस बात की विशिष्ट शक्ति देता है कि वह महामारियों के दौरान सख्त कदम उठा सके. इसमें धारा 2ए भी शामिल है, जो ऐसी खतरनाक बीमारियों को रोकने हेतु केंद्र सरकार को विशिष्ट शक्तियां प्रदान करते हुए उसे विभिन्न विनियमनों और कठोर कदम उठाने का अधिकार देता है. धारा तीन में इस कानून के उल्लंघन पर जुर्माने का ब्योरा शामिल है, जबकि धारा चार, इस अधिनियम के अंतर्गत कार्य करनेवाले लोगों के कानूनी संरक्षण का विवरण देती है.

इस तरह के सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से निबटने हेतु जरूरी कार्य-योजना की रूपरेखा बनाने हेतु नये कानूनी ढांचे के पक्ष में अच्छी दलीलें हैं. अभी के परिवर्तित सियासी, सामाजिक एवं आर्थिक संदर्भ में इस पुराने अधिनियम की अपनी सीमाएं हैं. एक शोध पत्रिका (इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल एथिक्स) के अनुसार, ‘यह अधिनियम महामारी की शुरुआत, बचाव तथा उसके संबोधन की समकालीन वैज्ञानिक समझ के अनुरूप न होते हुए केवल उन वैज्ञानिक और कानूनी मानकों को व्यक्त करता है, जो उसे पारित किये जाने के वक्त मौजूद थे.’ फिर भी, अब जब कोरोना वायरस फैल रहा है, तो इस कानून की शक्ति के इस्तेमाल का लोभ संवरण कर पाना मुश्किल तो है ही.

आज के परिवर्तित केंद्र-राज्य संबंधों के संदर्भ में, यह अधिनियम औपनिवेशिक राज्यों की शक्ति को मजबूत करता है, जबकि उसे ‘बचाव और प्रत्युत्तर, टीकाकरण, निगरानी और संगठित सार्वजनिक प्रत्युत्तर (रेस्पांस)’ पर जोर देना चाहिए था. गूगल इंडिया के बेंगलुरु स्थित एक कर्मी की पत्नी तथा ससुर द्वारा संक्रमण के संबंध में स्वास्थ्य अधिकारियों को कथित रूप से भ्रमित करने के आरोप में उन्हें इस अधिनियम की धारा के अंतर्गत आरोपित किये जाने से यही साबित होता है.

(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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