बढ़ती चीनी आक्रामकता

विश्व समुदाय में अलग-थलग पड़ते चीन को पड़ोसी देशों की सीमाओं का सम्मान तथा अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करना चाहिए.

वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की आक्रामकता बढ़ती ही जा रही है. सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर हुईं वार्ताओं का उस पर कोई असर नहीं दिख रहा है. लद्दाख क्षेत्र में चीनी जमावड़े के बरक्स भारत ने भी समुचित संख्या में सैनिकों की तैनाती पहले से ही की है. लेकिन पचास हजार अतिरिक्त सैनिकों को भेजकर भारत ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि चीन की हरकतों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जायेगा. यह एक ऐतिहासिक कदम है.

अभी तक भारत हमलों या घुसपैठ की स्थिति में ही सैनिकों की तैनाती करता आया है क्योंकि आक्रामकता हमारी रक्षा नीति का हिस्सा नहीं रही है. बीते एक साल से भी अधिक समय से चीन नियंत्रण रेखा पर सैनिक जमावड़े और घुसपैठ से भारत के धैर्य की परीक्षा ले रहा है. भारत शुरू से ही कहता रहा है कि बातचीत से ही विवादों का निपटारा होना चाहिए तथा सीमा पर यथास्थिति बहाल रखी जाए. लेकिन चीन अपने पड़ोसी देशों को अपनी आर्थिक और सामरिक धौंस से दबाने की कोशिश में है.

इस धौंस के प्रतिकार में अतिरिक्त तैनाती की गयी है. वर्तमान में सीमा पर लगभग दो लाख भारतीय सैनिक राष्ट्र की रक्षा हेतु जमे हुए हैं. पिछले साल की तुलना में यह संख्या 40 प्रतिशत अधिक है. प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख लगातार यह कहते रहे हैं कि हमारी सेना किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है. बड़ी संख्या में सैनिकों के डटे रहने से चीन की घुसपैठ को रोकने में तो मदद मिलेगी ही, अगर चीन की हरकतें नहीं थमीं, तो उसके इलाके में भी भारतीय सेना घुस सकेगी.

यह सैन्य रणनीति एक आवश्यक पहल है. इससे पहले चीन ने तिब्बत से अपनी फौजों को बुलाकर शिनजियांग सैन्य कमान के साथ लगाया है. यही कमान हिमालय के विवादित सीमा क्षेत्र की निगरानी करती है. इससे साफ संकेत मिलता है कि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा की मर्यादा का उल्लंघन करने पर आमादा है. ऐसे में जवाबी तैयारी कर भारत ने भी जता दिया है कि यदि चीन अपनी सैन्य ताकत के बल पर भारतीय क्षेत्र हथियाने की कोशिश करेगा, तो उसका उसी अंदाज में प्रतिकार किया जायेगा. अनेक देशों के साथ मिलकर भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता बहाल करने के प्रयास में जुटा हुआ है.

इससे चीन चिंतित है. ताइवान, साउथ और ईस्ट चाइना सी तथा लद्दाख में उसकी आक्रामकता इसी चिंता से पैदा हुई बेचैनी को इंगित करती है. जी-सेवन और नाटो की हालिया बैठकों में चीन के वैश्विक वर्चस्व की कोशिश को रोकने की तैयारियों से भी वह तिलमिला उठा है. तनातनी कभी भी बड़ी लड़ाई का कारण बन सकती है. विश्व समुदाय में अलग-थलग पड़ते चीन को पड़ोसी देशों की सीमाओं का सम्मान तथा अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करना चाहिए. उसकी हेठी उसे ही नुकसान पहुंचायेगी क्योंकि वह अकेले शेष विश्व का सामना नहीं कर सकता.

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Published by: संपादकीय

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