चिंताजनक भारी बारिश

बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन से मौसम में बदलाव कई वर्षों से देखा जा रहा है. दुनिया के जिन भागों में प्राकृतिक आपदाओं की बारंबारता बढ़ रही है, उनमें भारत भी शामिल है.

जलवायु परिवर्तन के गंभीर नतीजों में एक मानसून के मिजाज में बदलाव है. इस साल भारत के कई हिस्सों में मानसून के दौरान कम बारिश हुई, लेकिन सितंबर माह में सामान्य से बहुत अधिक बरसात हुई. इस वजह से बाढ़ की आपदा का सामना करना पड़ा. माना जा रहा था कि लौटते मानसून की ऐसी बारिश जल्दी थम जायेगी. पर, ऐसा नहीं हुआ और देश के अनेक भागों, खासकर तटीय और पर्वतीय इलाकों, में अक्तूबर में भी बड़ी मात्रा में बरसात हो रही है. तेज बारिश और अचानक बाढ़ की घटनाएं जान-माल के नुकसान की वजह बन रही हैं. देश की राजधानी दिल्ली में अक्तूबर में 1960 के बाद सबसे अधिक पानी बरसा है.

केरल में भयावह बाढ़ की स्थिति है. उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बादल फटने तथा भूस्खलन से कुछ साल पहले हुई केदारनाथ आपदा की यादें ताजा हो आयी हैं. अक्तूबर की बारिश के असर की चपेट में पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के हिस्से भी आये हैं. इन सभी क्षेत्रों में आम तौर पर लगातार तेज बरसात का रिकॉर्ड नहीं रहा है. इस स्थिति के प्राकृतिक कारणों में देर से आया मानसून, कई जगहों पर कम दबाव के क्षेत्रों का बनना तथा हवा की दिशा में बदलाव मुख्य हैं. अक्तूबर में अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और मध्य भारत के ऊपर कम दबाव के क्षेत्र बनने से देश के बहुत बड़े हिस्से में लगातार बारिश होती रही है. हालांकि अब हालात सुधरने के आसार हैं, किंतु कहीं-कहीं अभी भी तेज बरसात की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है.

सामान्यत: दक्षिण-पश्चिम मानसून अक्तूबर के पहले सप्ताह तक पूरी तरह लौट जाता है, पर इस साल यह प्रक्रिया ही छह अक्तूूबर के बाद शुरू हुई, जो अमूमन 17 सितंबर से प्रारंभ हो जाती है. अभी भी पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के हिस्सों तथा दक्षिणी तटीय इलाकों में मानसून सक्रिय है. धरती के बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम में बदलाव कई वर्षों से देखा जा रहा है. यह समूचे विश्व में हो रहा है. दुनिया के जिन भागों में इस कारण प्राकृतिक आपदाओं की बारंबारता बढ़ रही है, उनमें भारत भी शामिल है. शहरों में बाढ़, अचानक और लगातार बारिश, सूखा, शीतलहर, लू, जंगली आग, चक्रवात, आंधी आदि आम होते जा रहे हैं.

उत्तर, मध्य और पश्चिमी भारत में जाड़े के मौसम की अवधि घट रही है. सूखे इलाकों में अधिक वर्षा और समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी भी चिंताजनक हैं. निश्चित रूप से जलवायु परिवर्तन और आपदाओं की चुनौतियों के समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर त्वरित पहल की आवश्यकता है. भारत समेत अनेक देश इस दिशा में प्रयास भी कर रहे हैं. कुछ दिन बाद आयोजित हो रहे वैश्विक जलवायु सम्मेलन से भी बड़ी उम्मीदें हैं. साथ ही, आपदाओं से जान-माल की रक्षा के उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. आशा है कि केंद्र और राज्य सरकारें आपदा प्रबंधन की बेहतरी पर भी अधिक ध्यान देंगी.

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Published by: संपादकीय

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