अप्रत्याशित वृद्धि लायेगा आठवां वेतन आयोग

8th pay commission : मोटे तौर पर इस वेतन आयोग के माध्यम से एक करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक फायदा मिलेगा और ये औसतन पांच करोड़ या उससे अधिक लोगों के परिवारों के प्रतिनिधि होंगे. देश में हर वेतन आयोग 10 वर्षों के लिए गठित किया जाता है.

8th pay commission : केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा कर दी है, जिससे सरकारी कर्मचारियों के वेतन में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज होने की संभावना है. इससे न्यूनतम वेतन जहां 50,000 रुपये से अधिक होने की संभावना है, वहीं न्यूनतम पेंशन में भी काफी वृद्धि होने की संभावना है. नौकरीपेशा हर आदमी चाहता है कि उसका वेतन बढ़ता रहे. निजी क्षेत्र में वेतन वृद्धि की अलग प्रक्रिया है, जिसमें भेदभाव की आशंका रहती है. सरकारी क्षेत्र में भेदभाव न हो, इसके लिए वेतन आयोग का गठन कर विभिन्न वेतनमान में वृद्धि की सिफारिश की जाती है, जिसे वेतन आयोग कहा जाता है. समय के हिसाब से इनमें नये वेतन आयोग के माध्यम से महंगाई सहित दूसरे बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए रिवीजन होते रहते हैं.


अभी सातवां वेतन आयोग अस्तित्व में है. इसका गठन 2016 में हुआ था. दिसंबर, 2025 तक सातवें वेतन आयोग द्वारा तय वेतनमान ही प्रचलित रहेंगे. सातवें वेतन आयोग के तहत अभी न्यूनतम वेतन 18000 रुपये और न्यूनतम पेंशन 9000 रुपये है. मूल वेतन के अलावा सरकारी कर्मचारियों के कुल वेतन में महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता तथा यात्रा भत्ता सम्मिलित होता है. हालांकि इनमें महंगाई भत्ता मुख्य भूमिका निभाता है. अभी केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए इसकी तय सीमा मूल वेतन का 53 प्रतिशत है. वेतन आयोग की सिफारिशों से देश की कुल आबादी के पांच प्रतिशत से अधिक का हिस्सा आर्थिक रूप से समृद्ध होगा, क्योंकि अभी केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों के अंतर्गत करीब 50 लाख कर्मचारियों, रक्षा विभाग के सभी सैनिकों और 65 लाख पेंशनधारियों के लिए वेतन आयोग का गठन किया गया है. बैंकर्स वेतन आयोग में सम्मिलित नहीं है.

मोटे तौर पर इस वेतन आयोग के माध्यम से एक करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक फायदा मिलेगा और ये औसतन पांच करोड़ या उससे अधिक लोगों के परिवारों के प्रतिनिधि होंगे.
देश में हर वेतन आयोग 10 वर्षों के लिए गठित किया जाता है. प्रथम वेतन आयोग 1964 में अस्तित्व में आया था. हर वेतन आयोग की चर्चा उसकी वित्तीय नीतियों के माध्यम से कर्मचारियों के वेतन में होने वाली वृद्धि के लिए रहती है और यह भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार स्तंभ भी है. इसके माध्यम से सरकार अपने कर्मचारियों के आर्थिक उत्थान के साथ उनके सामाजिक विकास के लिए भी दृढ़ निश्चित दिखती है. हर 10 वर्ष बाद नये वेतन आयोग का गठन अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए किया जाता है. दूसरी तरफ आम आदमी को महंगाई का सामना करने के लिए वेतन वृद्धि का सहारा उपलब्ध करवाया जाता है.

वेतन आयोग द्वारा वेतन में होने वाली वृद्धि के संबंध में सिफारिश एक जटिल प्रक्रिया का भाग होती है. नये वेतनमानों से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ की गणना भी जरूरी होती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करते समय लगभग एक लाख करोड़ रुपये का आर्थिक बोझ वेतन और पेंशन के माध्यम से अर्थव्यवस्था पर पड़ा था. वेतन वृद्धि में सबसे मुख्य भूमिका ‘फिटमेंट फैक्टर’ की होती है, जो दरअसल भोजन, कपड़ा और मकान की न्यूनतम लागत निर्धारित करने का एक सूत्र होता है. इस फॉर्मूले का श्रेय डॉ वालेस एक्रॉयड को जाता है.

भारत में वेतन आयोग की सिफारिशों के अंतर्गत फिटमेंट फैक्टर को छठे और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों में सम्मिलित किया गया. छठे वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर 1.86 और सातवें वेतन आयोग में 2.57 था. आठवें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर 2.86 तक हो सकता है. इसी आधार पर न्यूनतम वेतन और न्यूनतम पेंशन के क्रमशः 50,000 तथा 25,000 या उससे अधिक होने की संभावना की जा रही है. फिटमेंट फैक्टर ही मूल वेतन में मुख्य भूमिका निभाता है.

सातवें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर 2.57 तय किया गया था, जिसके चलते मूल वेतन 7,000 रुपये से बढ़कर 18,000 रुपये हो गया. ज्ञात रहे कि विभिन्न भत्तों (महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता आदि) की गणना उनके निश्चित प्रतिशत के आधार पर फिटमेंट फैक्टर की गणना के पूर्व के मूल वेतन पर होती है.


अभी केंद्र सरकार द्वारा आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा अपने कर्मचारियों के लिए की गयी है. उसके बाद अलग-अलग राज्य अपने कर्मचारियों के लिए इसकी घोषणा करेंगे. सरकारी और निजी क्षेत्र में वेतन की अवधारणा अलग-अलग है. निजी क्षेत्र में पेशेवर योग्यता को प्राथमिकता देते हुए वेतन किसी भी सीमा तक जा सकता है. जबकि सरकारी क्षेत्र में वेतन तय मापदंड के अनुसार मिलता है और इसमें वार्षिक वृद्धि का प्रतिशत भी निश्चित है. निजी क्षेत्र में ऊपरी ओहदों पर वेतन सरकारी क्षेत्र के बड़े ओहदों से अधिक होते हैं, जबकि सरकारी क्षेत्र के बड़े पदों में विभिन्न कार्य शक्तियां निहित होती हैं. इसी कारण सरकारी क्षेत्र के बड़े पदों को समाज में ज्यादा रुतबा और महत्व मिलता है. वेतन आयोग के समय-समय पर गठन का मुख्य मकसद यह भी है कि सरकारी और निजी क्षेत्र के वेतनमानों की तुलना में पारदर्शिता बनी रहे और सरकारी क्षेत्र निजी क्षेत्र के मुकाबले वेतन में पिछड़ न जाये.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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