नारे लगाने से हल हो जायेगी समस्या?

।। दक्षा वैदकर।। (प्रभात खबर, पटना) शिक्षक, पिता, रिश्तेदार, पड़ोसी, बाबाओं, अधिकारियों आदि पर जब-जब यौन शोषण का आरोप लगा है, सबसे पहले जो लोग सामने आये हैं, वे हैं मीडियाकर्मी. यही वे लोग हैं, जो समाज को हर सच्चई से रू-ब-रू करवाते हैं कि किस तरह के घिनौने लोग हमारे इर्द-गिर्द रह रहे हैं. […]

।। दक्षा वैदकर।।

(प्रभात खबर, पटना)

शिक्षक, पिता, रिश्तेदार, पड़ोसी, बाबाओं, अधिकारियों आदि पर जब-जब यौन शोषण का आरोप लगा है, सबसे पहले जो लोग सामने आये हैं, वे हैं मीडियाकर्मी. यही वे लोग हैं, जो समाज को हर सच्चई से रू-ब-रू करवाते हैं कि किस तरह के घिनौने लोग हमारे इर्द-गिर्द रह रहे हैं. लेकिन आज सवाल उन्हीं मीडियाकर्मियों पर उठ गया है. एक शख्स ने गलती की है, जिसकी वजह से इस बिरादरी के सभी लोग कठघरे में खड़े हो गये हैं. फेसबुक पर कई ऐसे लोग हैं, जो इस मुद्दे पर इसलिए लिख रहे हैं, ताकि उन पर उंगली न उठायी जाये. ठीक वैसे ही जैसे कई बार चोरी करनेवाला खुद चिल्ला-चिल्ला कर कहता है ‘किसने चोरी की, पकड़ो उसे, उसे सजा मिलनी ही चाहिए.’

खैर, इन सब बातों से इतर मेरा मानना है कि हमें इस मुद्दे पर खुल कर लिखना चाहिए. आज शायद ही कोई ऐसा कार्यालय होगा, जहां ऐसी घटनाएं नहीं होतीं. बड़ी नहीं, छोटी ही सही, लेकिन होती जरूर हैं. कभी मजाक में सीनियर अपनी जूनियर के सिर पर टपली मार देता है, गाल थपथपा देता है. कभी पिता की तरह स्नेह दिखा कर पीठ पर हाथ फेर कर अंत:वस्त्रों को छूने की कोशिश करता है. कभी सहकर्मी ही इतना कस कर हाथ मिलाते हैं कि छोड़ने का नाम नहीं लेते, तो कभी मोबाइल में ऐसे गीत बजाते हैं, जो इशारे-इशारे में उनकी घिनौनी इच्छाओं को जाहिर करें. तरु ण तेजपाल की शिकायत करनेवाली पीड़िता की तरह सभी लड़कियां निडर नहीं होती. पारिवारिक जिम्मेवारियां, प्रतिस्पर्धा के जमाने में दूसरी नौकरी न मिल पाने और बदनामी का भय उनके अंदर इस कदर हावी रहता है कि वे सारी चीजें सहन करती जाती हैं. ये भी मान कर चलती है कि स्त्री का जीवन ही ऐसा है. नौकरी करना है, तो यह सब सहन करने की आदत डाल ही लेनी चाहिए.

ऐसे कई किस्से कार्यालयों में होते हैं, जो अखबारों में नजर नहीं आते. लड़कियां शिकायत करती हैं, अपराधी को बस डांट-फटकार के छोड़ दिया जाता है और फिर वह अन्य लोगों के साथ मिल कर लड़की को बदनाम करने में लग जाता है. पिछले दिनों बैंक में कार्यरत एक युवती ने बताया कि मैनेजर उसे परेशान कर रहा था. उसने पुलिस को शिकायत की, तो पुलिस और मैनेजर ने मिल कर मामला रफा-दफा कर दिया. युवती को नौकरी छोड़नी पड़ी. आखिर इन चीजों को खत्म कैसे किया जाये. सड़क पर उतर कर नारे लगाने से, ‘हमें हक चाहिए, अपराधी को सजा दो..’ क्या यह समस्या हल हो जायेगी? दरअसल कामकाजी युवितयां आज भी अपने अधिकारों से वाकिफ नहीं हैं, न्याय के लिए गलत दरवाजा खटखटा रही हैं. हमें कार्यालयों में इस पर कार्यशालाएं करनी चाहिए. महिला कर्मचारियों को उनके अधिकारों, शिकायत की प्रक्रि या के बारे में बताना चाहिए. महिला को इस पूरी प्रक्रिया में भरोसा दिलाना होगा, ताकि वे खुल कर शिकायत कर सकें.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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