सब धान बाइस पसेरी नहीं, पर..

।। राजेंद्र तिवारी ।। (कारपोरेट संपादक, प्रभात खबर) तरुण तेजपाल प्रकरण को लेकर तमाम तरह की बातें विभिन्न प्लेटफार्मो पर की जा रही हैं- मीडिया में गंदगी से लेकर समाज में गंदगी तक. कुछ लोग इसको राजनीतिक रंग दे रहे हैं, तो कुछ लोग सब धान बाइस पसेरी की कहावत कह रहे हैं मानो सांप्रदायिकता, […]

।। राजेंद्र तिवारी ।।

(कारपोरेट संपादक, प्रभात खबर)

तरुण तेजपाल प्रकरण को लेकर तमाम तरह की बातें विभिन्न प्लेटफार्मो पर की जा रही हैं- मीडिया में गंदगी से लेकर समाज में गंदगी तक. कुछ लोग इसको राजनीतिक रंग दे रहे हैं, तो कुछ लोग सब धान बाइस पसेरी की कहावत कह रहे हैं मानो सांप्रदायिकता, दक्षिणपंथी विचारधारा और कुपरंपराओं आदि का विरोध करनेवाले सभी लोग तरुण तेजपाल जैसे ही हैं. इस तरह की बातें सबसे जोर-शोर से उस विचारधारा और राजनीतिक दल के समर्थकों की ओर से आ रही हैं जो देश को श्रेष्ठ बनाने के अभियान में लगे होने का दावा कर रहे हैं. यह बहुत चिंता की बात है. क्या इस तरह की घटनाओं को राजनीतिक बदले की भावना से देखा जाना चाहिए? अगर नारायणदत्त तिवारी से लेकर राघवजी के प्रकरणों का सामान्यीकरण किया जाने लगे, तो जरा कल्पना कीजिए कि कौन-सी तसवीर सामने आयेगी. लेकिन क्या यह तसवीर सच्चई बयान करनेवाली होगी?

मेरे जेहन में अपने कैरियर के 21 सालों में सुने गये किस्से, अफवाहें, घटनाएं आदि उभर रही हैं. तरुण तेजपाल के मामले में फेसबुक पर एक कमेंट है कि संपादक तो कई ऐसे हैं, फंसा एक है. सही बात है. पिछले 21 साल पर नजर डालता हूं, तो पाता हूं कि कितनों के बारे में यह जुमला आम था कि ये तो लंगोट का कच्चा है. इसका अर्थ क्या हुआ? दिल्ली के एक दफ्तर में तो एक महिला रिपोर्टर ने अपने संपादक पर चप्पल निकाल दी थी. लेकिन हुआ क्या? एक न्यूजरूम का वाकया मैं यहां शेयर करना चाहता हूं. एक ट्रेनी रिपोर्टर शिकायत लेकर न्यूज एडीटर के पास पहुंची कि उसे ऑफिस के फलां व्यक्ति तंग करते हैं. न्यूज एडीटर ने उस व्यक्ति को बुला कर खूब डांटा और उसी रात ट्रेनी रिपोर्टर को मैसेज करने शुरू कर दिये. आप ही सोचिए कि क्या ट्रेनी रिपोर्टर आगे हिम्मत कर सकती थी कि वह न्यूज एडीटर की शिकायत बड़े पद पर आसीन किसी व्यक्ति से करे. नहीं. और इसलिए उसने जाब छोड़ दी.

एक और वाकया.. एक अखबार के कार्यालय में एक महिला रिसेप्शनिस्ट थी. उसको उस अखबार के संपादक और जीएम, दोनों ही अपने केबिन में घंटों बैठाये रखते थे. अपने हर काम के लिये पीए तक से उसी रिसेप्शनिस्ट को भेज देने को कहते थे. दफ्तर में यह चर्चा का विषय था और पुरुष कर्मियों ने उस महिला का नाम ‘दफ्तरी लैला’ रख दिया. उसके सामने ही लोग दफ्तरी लैला के किस्से बना कर सुनाते. वह कहां जाती, आजिज होकर दफ्तर आना बंद कर दिया. ये सब किस्से 1992 से 2013 के बीच अलग-अलग समय और अलग शहर के हैं. उत्तर भारत के एक शहर में एक अंग्रेजी अखबार के संपादक के केबिन के साथ आराम करने की जगह भी बनी हुई थी. उस अखबार में इस बात पर जोर दिया जाता था कि लड़कियों को रिपोर्टर रखा जाये. लेकिन अधिकतर लड़कियां उस अखबार से छह माह में ही बाहर हो लेती थीं. पूरा शहर यह बात जानता था, लेकिन क्या किसी ने आवाज उठायी?

एक और संपादक का किस्सा. वह अपने न्यूजरूम की महिला रिपोर्टरों और सब-एडीटरों के सिर पर (बालों में) हाथ फेरते थे और यह दिखाने की कोशिश करते थे कि ऐसा वे स्नेहवश कर रहे हैं. लड़कियां कुछ न कह पातीं, क्योंकि फिर लोग उनको (लड़कियों) ही कटघरे में खड़े करने लगते कि संपादक जी तो पितातुल्य स्नेह देते हैं और यह लड़की बेजा फायदा लेना चाहती होगी, इसलिए आरोप लगा रही है. बेचारी लड़कियां इसलिए चुप रहतीं कि कुछ बोलेंगी तो बदनामी हो जायेगी और उनके लिए नौकरी मिलनी मुश्किल हो जायेगी.

एक किस्सा राजस्थान का. एक प्रतिष्ठित वरिष्ठ रिपोर्टर ने अपनी सहयोगी रिपोर्टर को सुबह का असाइनमेंट दिया और रात को चलते समय उससे बोला कि मुङो भी सुबह उधर जाना है, इसलिए तुमको लेता चलूंगा. सुबह वे वरिष्ठ रिपोर्टर महोदय लड़की के घर अपने स्कूटर से पहुंच गये. लड़की उनके साथ असाइनमेंट के लिए चल दी. रास्ते में उन्होंने अजीब हरकतें कीं. लड़की ने उन वरिष्ठ रिपोर्टर की लिखित शिकायत की, तो उस लड़की को ही काम पर आने से मना कर दिया गया. एक किस्सा और, एक बड़े अखबार के नामी व दबंग संपादक अपनी सबसे प्रिय रिपोर्टर से नाराज हो गये कि उसने उनकी बात नहीं मानी (कौन सी बात, पता नहीं). संपादक महोदय ने उस लड़की रिपोर्टर को सबके सामने अपशब्द कहे और गुस्से में अपने कुछ खास लोगों से कहा कि उसके घर जाओ और हमने उसे जो दिया है, उठा लाओ. जी हां, यह सब खुले आम हुआ. ये सब सच्ची घटनाएं हैं, अलग-अलग-अलग जगहों और अलग-अलग समय की. यानी ये घटनाएं किसी एक शहर, एक प्रदेश में ही नहीं हो रहीं. और हां, आज ही शुरू नहीं हुई हैं. विफलता किसकी है?

यह तरुण तेजपाल से जुड़ा मामला था और लड़की रिपोर्टर की बैकग्राउंड भी मजबूत थी. लेकिन यदि यही किस्सा किसी सामान्य दफ्तर में किसी साधारण पृष्ठभूमि- वाली लड़की के साथ होता तो क्या इसे इतना ही महत्व मिलता. यह सवाल महत्वपूर्ण है, बहुत महत्वपूर्ण. दरअसल, सामान्य तौर पर हम इन मामलों को दबा देते हैं. लड़की कुछ आवाज उठाने की कोशिश भी करती है, तो उसके परिवार को समझा दिया जाता है कि इससे बदनामी के अलावा कुछ भी हाथ न लगेगा. कई जगह यह देखने को मिलता है. मेरी जानकारी में ऐसा कोई संस्थान अपने देश में नहीं है जहां जेंडर सेंसिटिविटी सबसे ऊपर रखी जाती हो और संस्थान ज्वाइन करनेवाले हर महिला व पुरुष को इसके बारे में जानकारी दी जाती हो. सिर्फ बिसाखा टाइप चीजें बना देनें से कुछ नहीं होने वाला, वैसा माइंडसेट बनाना पड़ेगा. इस माइंडसेट के लिए पूरे समाज में एक बहस छेड़नी होगी, बिना लाग-लपेट के.

और अंत में..

तहलका के एक बेहतरीन रिपोर्टर की टिप्पणी जो उन्होंने फेसबुक पर साझा की है-

कल सुबह सुबह बाहर से लौटा. जहां था, वहां फोन काम नहीं कर रहा था. कल से अब तक 200-300 से ज्यादा कॉल आये. ऐसे-ऐसे खैरख्वाह खैरियत पूछ रहे हैं, जिन्हें जानता तक नहीं. घुमा-फिरा कर एक ही सवाल- क्या हुआ तहलका में, कैसे हुआ, क्या होगा आगे, लड़की का नाम बताइए न.. आदि-इत्यादि. सबसे एक ही बात कह रहा हूं, टीवी के पास समय गुजारिए, मेरे पास इतना समय नहीं है. फिर भी मुझसे ही जानने की उत्सुकता है, तो सुनिए साहब- गुनाह कोई करे, किसी के साथ हो, उसके लिए गुनहगार को सजा का पक्षधर हूं. और हां, इस बात का भी पक्षधर हूं कि तहलका जैसी पत्रिका अपनी गति से चले. कोई रहे, न रहे, मै भी वहां रहूं, न रहूं.. यह महत्वपूर्ण नहीं है. जो भी थोड़ी बहुत पत्रकारिता की दुनिया की समझ है, उसके आधार पर कह रहा हूं, तहलका जैसी पत्रिका का चलते रहना जरूरी है. तहलका के साथ था, हूं..

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >