किसी देश में पहले से चली आ रही राजनीतिक परंपराएं तय करती हैं कि वह देश किस सीमा तक लोकतांत्रिक हो पायेगा. नेपाल के चुनाव-परिणामों के रुझानों का सबसे गहरा इशारा यही है. नेपाल के करोड़ों मतदाताओं ने यह संकेत दे दिया कि वे लोकतंत्र के पक्ष में हैं, लेकिन अपने को नेपाल का एकमात्र भविष्य-निर्माता मान कर चलनेवाला माओवादी दल मतदाताओं की समवेत मर्जी को नहीं पचा पा रहा है.
खुद को नेपाल का सर्वेसर्वा मानने की भूल करनेवाले, द यूनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-माओइस्ट के अगुआ पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’, जो चुनाव हार गये हैं, मतदाताओं की मर्जी को ठुकराते हुए कह रहे हैं कि हम फिर से एक जन-आंदोलन छेड़ेंगे. ऐसे में नेपाल में विचित्र स्थिति पैदा हुई है, क्योंकि जनता तो लोकतंत्र की राह पर चलने को तैयार है, लेकिन उसकी नुमाइंदगी का दम भरनेवाला एक प्रमुख दल जनता के फैसले को अपनी मर्जी के विपरीत पाकर लोकतंत्र की राह में रोड़े अटका रहा है.
नेपाल की राजशाही को अपने सशस्त्र आंदोलन के जरिये चुनौती देनेवाले माओवादी आंदोलन ने सात साल पहले हथियार छोड़ कर चुनावी राजनीति का रास्ता अपनाया था और एकबारगी लगा था कि नेपाल लोकतंत्र की राह पर चल निकलेगा. एक दशक तक जारी गृहयुद्ध-सी स्थिति से उबरने के बावजूद लगातार छह सरकारें नये लोकतांत्रित गणराज्य नेपाल की स्थापना के लिए जरूरी संविधान तक नहीं बना सकीं. वहां पिछले साल पार्टियों की पारस्परिक असहमति के बीच असेंबली भंग हुई थी. पार्टियां वह आधार नहीं खोज पायीं, जिसके सहारे नेपाल को संघीय ढांचे के भीतर विभिन्न ईकाइयों में बांटा जाये.
माओवादी और मधेशी पार्टियां चाहती थीं कि ईकाइयों का विभाजन जातीयता के आधार पर हो, जबकि नेपाली कांग्रेस और यूएमएल आर्थिक पैमाने पर विभाजन के पक्ष में थीं. चुनाव-परिणाम के रुझान कह रहे हैं कि जनता ने नेपाली कांग्रेस और यूएमएल का साथ दिया. मुख्यधारा की राजनीति करनेवाली पार्टी को जनादेश का सम्मान करना होता है. लेकिन लगता है कि माओवादी पार्टी में यह लोकतांत्रिक परिपक्वता अभी नहीं आयी है. यह एक बार फिर नेपाल को राजनीतिक गतिरोध और अस्थिरता के मुहाने पर खड़ा कर सकता है.
