किताबों से दूरी से वैचारिक क्षरण

आज हम निश्चित तौर पर तकनीक के क्षेत्र में काफी अग्रसर हो गये हैं और इसका उपयोग शिक्षा और अध्ययन के क्षेत्र में भी प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर हो रहा है. लेकिन, यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि गंभीर अध्ययन की प्रवृत्ति में कमी आयी है और इसकी सबसे बड़ी वजह टेलीविजन, […]

आज हम निश्चित तौर पर तकनीक के क्षेत्र में काफी अग्रसर हो गये हैं और इसका उपयोग शिक्षा और अध्ययन के क्षेत्र में भी प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर हो रहा है. लेकिन, यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि गंभीर अध्ययन की प्रवृत्ति में कमी आयी है और इसकी सबसे बड़ी वजह टेलीविजन, कंप्यूटर, मोबाइल आदि चीजों का दिनोदिन होता प्रसार है.

एक दौर था जब पाठ्यक्रम के अतिरिक्त महत्वपूर्ण किताबें खरीदी जाती थीं, उपहारस्वरूप किताबें दी जाती थीं और साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं की खरीदारी भी होती थी. आज यह एक पुरानी बात सी बन गयी है. आज की पढ़ाई भी सूचनाओं और तथ्यों पर आधारित है, जो इंटरनेट और पाठ्यक्र म के पुस्तकों से उपलब्ध हो जाते हैं. हर क्षेत्र में सिर्फ प्रायोजित प्रतियोगिताओं में सफल होने पर नियुक्तियों के कारण तथ्यात्मक जानकारियां ही महत्वपूर्ण हो गयी हैं. यही वजह है कि गंभीर व चिंतनशील रचनाएं या किताबें कम ही पढ़ी जा रही हैं.

टेलीविजन निस्संदेह समय की बर्बादी का कारक है. आज के युवा नामचीन साहित्यकारों या चिंतकों के नाम तक नहीं जानते. लोग भूलते जा रहे हैं कि रचनात्मक अध्ययन से ज्ञान और कल्पना में वृद्धि होती है और यह मस्तिष्क के लिए पौष्टिक आहार जैसा है. किताबों को अब मित्र का दर्जा नहीं दिया जाता. किताबों से जीवन का दर्शन गठित होता है. आज की फास्ट-फॉरवर्ड जिंदगी में दिन-प्रतिदिन पुस्तक अध्ययन में कमी के कारण लोग एटीएम-केंद्रित होते जा रहे हैं और द्वेष, घृणा, निंदा आदि असामाजिक प्रवृत्तियां बढ़ी हैं और सामाजिक समरसता एक मिथक साबित होती जा रही है. वक्त आ गया है जब फिर से किताबों से दोस्ती की जाये.
मनोज आजिज, आदित्यपुर, जमशेदपुर

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