बदलता भारत, बजता ढोल!

।। चंदन श्रीवास्तव ।। (सीनियर फेलो, सीएसडीएस) कैसा लगेगा अगर किसी मीठी धुन का अंत एक धमाके से हो? याद करें क्रिकेट के मैदान से सचिन तेंडुलकर की विदाई का दृश्य! ऐन मैदान के बीच वह समवेत रोना-धोना, गाल-बजाना! सचिन के विदाई भाषण का मम्मी-पापा, भइया-दीदी, सुसुरबाड़ी! और फिर इस ‘रात की सुबह नहीं’ के […]

।। चंदन श्रीवास्तव ।।

(सीनियर फेलो, सीएसडीएस)

कैसा लगेगा अगर किसी मीठी धुन का अंत एक धमाके से हो? याद करें क्रिकेट के मैदान से सचिन तेंडुलकर की विदाई का दृश्य! ऐन मैदान के बीच वह समवेत रोना-धोना, गाल-बजाना! सचिन के विदाई भाषण का मम्मी-पापा, भइया-दीदी, सुसुरबाड़ी! और फिर इस ‘रात की सुबह नहीं’ के अंदाज में चलनेवाली वह पार्टी. टेलीविजनी समाचारों में इस पार्टी का बेतरह शोर है. यह शोर आपको नयी फिल्म बॉस का एक कनफोड़ गाना याद दिलाता है, जिसमें पूरी दुनिया को चैलेंज करते हुए कहा गया है- ‘सुन लो सारी दुनिया वालों, जितना भी तुम जोर लगा लो, करेंगे पार्टी सारी रात..’ अचरज नहीं कि इस गीत में एक जिद टेक की तरह बजती है‘बजाते रहो सबकी’ ..और ‘पार्टी यूं ही चलेगी.’ किस्सा कोताह यह कि अगर सचिन तेंडुलकर का नाम संयम, धीरज, साहस से भरी शतकवीर पारियों के लिए रूढ़ हो गया है, तो उनकी विदाई का दृश्य ठीक इसकी काट प्रस्तुत करता है असंयम, अधीरज और दुस्साहस से भरा हुआ.

और, लग सकता है कि इस मौके पर सचिन तेंडुलकर को ‘भारत-रत्न’ से नवाज कर अधीरज का परिचय भारत सरकार ने भी दिया. अधीरज का परिचय इसलिए कि सचिन तेंडुलकर का नाम ‘भारत-रत्न’ की परंपरा में एक उलट-फेर करता है. सचिन ‘भारत रत्न’ की पंक्ति में सबसे कमउम्र (40साल) हैं. याद करें, समाजसेवी धोंडो केशव कर्वे को उनकी उम्र के 100वें पड़ाव पर भारत रत्न से नवाजा गया था और खुद सचिन के साथ जिस वैज्ञानिक सीएनआर राव को यह सम्मान दिया गया है, वे भी 75 पार के हैं. परिपाटी को ध्यान में रखें, तो यही लगेगा कि ‘भारत रत्न’ का अलंकरण किसी व्यक्ति के पूरे सक्रिय जीवन के मूल्यांकन को अपना आधार बनाता है. इस कोण से देखें, तो सचिन को ‘भारत-रत्न’ से नवाजते ही यह परिपाटी भंग होती है, क्योंकि क्रिकेट के मैदान के बाहर उनके सक्रिय जीवन के ढेर सारे वर्ष अभी शेष हैं, सो उनका मूल्यांकन भी. बात का संक्षेप यह कि व्यक्ति के बारे में एक आशंका होती है कि जीवन के किसी मोड़ पर किन्हीं हालातों के बीच वह अपनी स्वाभाविक अच्छाई या विशिष्टता से गिर सकता है, जबकि भारत रत्न का अलंकरण स्वाभाविक तौर पर व्यक्ति के बारे में इस आशंका के निषेध और उपचार पर टिका है.

परिपाटी का भंग होना एक छोटी बात है. दलील दी जा सकती है कि परिपाटी बनती ही है टूटने के लिए. बड़ी बात यह है कि सचिन को भारत रत्न देना खुद भारत विषयक विचार (आइडिया) की निरंतरता में एक हस्तक्षेप की सूचना और उसकी औपचारिक स्वीकृति है. इस बात के खुलासे के लिए भारत रत्नों की सूची पर गौर करना होगा. इस सूची में सर्वाधिक नाम राजनेताओं के हैं और फिर वैज्ञानिकों के. अगर 1980 को एक सुविधाजनक सीमा-रेखा स्वीकार करें, तो भारत रत्न अलंकरण से सुशोभित व्यक्तियों में बस चंद नाम ही ‘कला और साहित्य’ या फिर समाज-सेवा क्षेत्र के हैं. एक नाम तो मदर टेरेसा (1980) का है और इसके बाद बस तीन नाम हैं- डॉक्टर भगवान दास (1955), धोंडो केशव कर्वे (1958) और पांडुरंग वामण काणे (1963) के. लेकिन, 1990 के दशक के बाद यह सूची बहुरंगी होने लगती है. पहली बार सूची में उद्योगपति (जेआरडी टाटा-1992) और फिल्मकार (सत्यजित रेत्न 1992) का नाम आता है और अर्थशास्त्री (अमर्त्य सेन-1999) का भी. 1992 के बाद सूची में कला-जगत की हस्तियों के नामों की संख्या आश्चर्यजनक तौर पर बढ़ती है और हम एमएस सुब्बुलक्ष्मी(1998), पंडित रविशंकर(1999), उस्ताद बिस्मिल्लाह खान(2001), लता मंगेशकर (2001) तथा पंडित भीमसेन जोशी(2008) के नाम शामिल पाते हैं.

1980 के बाद आया यह बदलाव भारत विषयक विचार में आये बदलाव की सूचना है. 1980 के पहले का भारत संघीय प्रणाली के भीतर केंद्रीय शासन की मजबूती, इसी के अनुकूल राजनीति में एक दल (कांग्रेस) के वर्चस्व और अर्थव्यवस्था के भीतर केंद्रीकृत नियोजन वाला भारत है- यानी एक ऐसा भारत जिसकी प्रधान समस्या राष्ट्रीय एकता-अंखडता की रक्षा के साथ सांप्रदायिक सौहार्द बनाये रखते हुए लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना है. इस भारत की राजनीतिक बुनावट कुछ ऐसी है कि जनता की समस्त आशाओं के केंद्र में राजनेता को ही रहना है, या फिर एक हद तक विज्ञान को, क्योंकि जवाहरलाल नेहरू के प्रसिद्ध वाक्यांश का सहारा लें, तो बांध और नहर ‘नये भारत के मंदिर’ हैं. 1980 के दशक के आखिर के वर्षो में भारत विषयक यह विचार एकबारगी करवट लेता है. राजनीति में एकदलीय (कांग्रेस) वर्चस्व टूटता है, केंद्र में प्रधानमंत्री की कुर्सी के पायों की मजबूती इस बात से तय होने लगती है कि कितने राज्यों के कितने मुख्यमंत्रियों ने अपने अलग-अलग दलों के साथ उसे थाम रखा है.

यहां अर्थनीति एकदम से उलट जाती है. इसका जोर भारत को विश्व की आर्थिक-महाशक्ति बनाने पर चला आता है. भारत बदल कर ‘ब्रांड इंडिया’ कहलाने लगता है. ब्रांड इंडिया के तौर पर भारत की छवि के निर्माण में संचारृ-माध्यम (टेलीविजन और फिल्म) खासतौर से महत्वपूर्ण साबित होते हैं. इस बदलाव के बीच भारतीय राष्ट्रवाद के आंगन में अगर पहले हनुमत-ध्वजा का स्थान राजनीति और राजनेता को प्राप्त था, तो अब भारतीय राष्ट्रवाद की रक्षा में एक से ज्यादा देव आ जुटते हैं. खेल (क्रिकेट और उसके नायक) और फिल्म (बॉलीवुड और उसके महानायक) वैश्विक पूंजी से साङोदारी करते भारतीय राष्ट्रवाद की रक्षा और वृद्धि में लगे ऐसे ही देव हैं. इस देवमाला को आगे बढ़ाना चाहें, तो इसमें एनआरआइ निवेशकों और सूचना-क्रांति को आगे ले जाने में लगे प्रबंध-प्रवीरों (सीइओ) के नाम जोड़ सकते हैं.

बात का संक्षेप यह कि 1980 के बाद के भारत में राष्ट्रवाद की दावेदारी करनेवाले क्षेत्र (फिल्म, खेल, मीडिया और पूंजी-बाजार) राजनीति के पिछलग्गू नहीं रहते, बल्कि एक हद तक स्वायत्त हो जाते हैं और वे चाहते हैं कि उनके गढ़े हुए महानायकों को भी भारत का रत्न स्वीकारा जाये. इस क्रम में घाटा मूल्यबोध का होता है और वह ऐसे कि अगर पहले के समय में भारत-रत्न देने की मूल प्रेरणा नि:स्वार्थ सेवात्नभावना थी, तो अब के समय में उसका मूल प्रेरक भाव आर्थिक-वृद्धि में योगदान और उससे हासिल लोकप्रियता है. तेंडुलकर को भारत रत्न देने के लिए इस अलंकरण के दायरे में आनेवाले क्षेत्र की परिभाषा में बदलाव इसी मूल्यबोध की स्वीकृति है.

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