।।एमजे अकबर।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
सोलह वर्षीय मलाला यूसुफजई एक दिन पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनना चाहती है. पिछले हफ्ते वह शांति के लिए नोबेल पुरस्कार की विजेता भी बन सकती थी. देखा जाये, तो इन दोनों में पहली नियति कहीं बेहतर है. नोबेल पुरस्कार सामान्यत: तब मिलता है, जब व्यक्ति अपनी महत्ता खो चुका होता है. निश्चित तौर पर पुरस्कार के तौर पर मिलनेवाले घंटे और चेक से मलाला को ही नहीं, सुर्खियों के लिए लालायित मीडिया को भी काफी मदद मिलती. लेकिन, एक राजनीतिज्ञ के तौर पर मलाला पाकिस्तान के ज्यादा काम आयेगी. मलाला बहादुर लड़की है.
बेहतर भविष्य का सपना देखने के लिए भी और देश को बर्बाद करने पर तुले लोगों की गोली का शिकार होने के कारण भी. सबसे खराब किस्म का लैंगिक शोषण पाकिस्तानी कट्टरपंथियों के सोच का केंद्रीय तत्व है. वे देश को ‘जाहीलिया’ यानी पूर्वाग्रह और अज्ञानता के दिनों की ओर ले जाने पर आमादा हैं. इसलाम ने शिशु कन्या की हत्या जैसी कई कुरीतियों को प्रतिबंधित करके अरब महिलाओं का दिल जीता. पाकिस्तानी तालिबान और उसके समर्थक छठी शताब्दी में जीते हैं. वे उस धर्म को शर्मसार करते हैं, जिसके वे अनुयायी हैं.
आश्चर्यजनक यह है कि इसके बावजूद जमीनी स्तर पर उनका असर कम नहीं हो रहा है और पाकिस्तान का सियासी वर्ग उनके साथ बातचीत को लेकर उत्साही है. जो सवाल अकसर नहीं पूछा जाता और जिसका जवाब कभी नहीं मिलता, यह है कि आखिर बातचीत करने के लिए है क्या? उन कट्टरपंथियों से बातचीत का एजेंडा क्या होना चाहिए, जो हत्या को न सिर्फ अपना सबसे महत्वपूर्ण अस्त्र बल्कि अपनी विचारधारा भी मानते हैं. तालिबान और उसके संतान सत्ता चाहते हैं. क्या पाकिस्तान के राजनेता उन्हें इसकी पेशकश करनेवाले हैं? क्या कोई ऐसा है जो इन कट्टरपंथियों के तुष्टीकरण के लिए सिंधु के उत्तर-पश्चिम के हिस्से में उनके साथ सत्ता साझा करने को तैयार है? कुछ मसजिदों और सार्वजनिक सभाओं से दिये जानेवाले इनके उन्मादी नारों पर कोई लगाम नहीं लगा सकता. क्या इन्हें पैसे से खरीदा जा सकता है? इसकी संभावना काफी कम है, क्योंकि उनके पास देसी और विदेशी स्रोतों से मिलनेवाले पैसे की कोई कमी नहीं है. यहां एक नाजुक सवाल पैदा होता है. क्या इस बात की कोई गारंटी है कि वे कभी पाकिस्तान के साथ सहयोग करने को तैयार होंगे और अपनी बंदूकों को सिर्फ उन इलाकों की ओर मोड़ देंगे, जो पाकिस्तान के इरादों के मुफीद हो. क्या वे सिर्फ अफगानिस्तान और भारत पर निशाना साधेंगे और पेशावर और क्वेटा को छोड़ देंगे?
असहज सवालों को नजरअंदाज करने भर से उन्हें सुलझाया नहीं जा सकता. अगर आज मलाला ब्रिटेन की स्कूल में है, तो इसकी वजह कट्टरपंथी ही हैं. अगर वह राजनीतिक कुर्सी के सहारे उनके कुचक्र को चुनौती देना चाहती है, तो सिर्फ इस कारण कि वह जानती है कि वे किस तरह पाकिस्तान के लिए खतरा हैं. मलाला की उम्र अभी कम है. उसे सपने देखने का पूरा अधिकार है. खासकर इसलिए भी क्योंकि उसे दूसरा जीवन मिला है. उसके सपने सत्तर साल के बूढ़े जनरल परवेज मुशर्रफ की कपोल कल्पनाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं. मुशर्रफ के लिए सबसे अच्छा विकल्प है कि वे दुबई या अमेरिका, जहां उन्हें ज्यादा पैसा मिले शरण ले लें, बजाय इसके कि वे पाकिस्तान पर राज करने का ख्वाब देखें और खुद को ‘उद्धारक’ के तौर पर पेश करें. पाकिस्तान कई अर्थो में मुशर्रफ से काफी दूर निकल चुका है. यह अलग बात है कि वह कई मामलों में काफी पीछे भी गया है. इतना तय है कि अब पाकिस्तान में बूढ़े तानाशाहों के लिए कोई जगह नहीं है.
अगर पकिस्तान को सचमुच में खुद को बचाना है, तो उसे सत्ता में युवकों और युवतियों को लाना होगा. उसे ऐसे अधिकारियों की जरूरत है, जिन पर हालिया इतिहास का बोझ न हो. ब्रिटेन में मलाला के पास वह सबकुछ है, जो उसकी उम्र के बच्चे सोच सकते हैं. अच्छी शिक्षा, एक भविष्य और प्रशंसा में लगा ब्रिटिश मीडिया जो उस पर इस कारण दावं लगा रहा है, क्योंकि उसे लग रहा है कि एक दिन मलाला को नोबेल पुरस्कार मिलेगा. मुझे पक्का यकीन है कि नोबेल पुरस्कार पाने की तमन्ना मलाला के मन में किसी से भी ज्यादा थी. लेकिन वह पाकिस्तान में शांति चाहती है, ब्रिटेन में नहीं. वह लाहौर या पेशावर की युवती होना चाहती है. ब्रैडफोर्ड या बरमिंघम की नहीं. क्या ऐसा कभी मुमकिन हो पायेगा? इसकी उम्मीद बहुत कम नजर आती है. लोगों ने नवाज शरीफ को वोट इसलिए दिया था, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि वे देश को शांति की ओर ले जायेंगे. फिलहाल वे काफी सुस्त रफ्तार से चलते दिख रहे हैं और दिशाहीन हैं. कहा जा सकता है कि अभी उन्हें कुर्सी संभाले ज्यादा वक्त नहीं हुआ है. लेकिन, अगर शरीफ नाकाम होते हैं, तो मलाला और उसकी पीढ़ी को एक और सवाल का सामना करना पड़ेगा- क्या कोई कुछ भी नहीं कर सकता?
एक किशोरी, जो मौत के मुंह के पास खड़ी थी, लेकिन जिसने कभी उम्मीद नहीं खोयी, उसे निराशा भरी दिलासाओं की जरूरत नहीं. यह जरूरी नहीं कि सपने हमेशा सच हों, लेकिन ऐसे कितने लोग हैं, जिन्हें दूसरी जिंदगी मिलती है?
