आजकल हम उत्सवधर्मी हो चले हैं और किसी भी पर्व-त्योहार के मूल उद्देश्य या महत्व को समझने की कोशिश नहीं करते. आज के पर्व पैसों पर मनाये जा रहे हैं. इन दिनों चल रहे नवरात्र के दौरान लोग अपनी-अपनी खरीदारी और खान-पान की व्यवस्था जुटाने में ही ज्यादातर व्यस्त हैं. लेकिन इन सब से इतर, जरूरत इस बात की है कि घर के बड़े-बुजुर्ग, बच्चों और युवाओं को हमारे जीवन में इन पर्वो की महत्ता और भूमिका बतायी जाये, ताकि वे इन पारंपरिक पर्वो से उचित ज्ञान और मार्गदर्शन ले सकें.
नवरात्र नौ रात्रियां, साधना की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण हैं. इस दौरान अधिकांश समय हम चित्त शुद्ध करने में बितायें, ताकि आसुरी प्रवृत्तियां नष्ट हों और हम सन्मति के मार्ग पर चल सकें. नवरात्र-साधना के दौरान पालन किये जानेवाले नियम और आदर्श दिनचर्या हमें साल भर संतुलित एवं संयमित ढंग से जीवन जीना सिखाती हैं. अत: अनुष्ठान के उपरांत भी अपने जीवन को सात्विक तरीके से जीने का प्रयास करना चाहिए, तभी हम नवरात्र में अर्जित की गयी शक्ति का सार्थक उपयोग कर पाने में समर्थ हो पायेंगे. आज के समय में यह जरूरी भी है.
हमारे लिये जरूरत इस बात की है कि हम सिर्फ पर्वो की विधियों में उलङो न रहें, बल्कि आत्मबोध विकसित करें. नवरात्र-साधना से हम अपने चित्त के सभी विकार, कलुषित प्राण एवं दूषित वृत्तियों को परिष्कृत करें. साधना के लिए शरीर और मन, दोनों को स्वच्छ रखना जरूरी है और हम सभी यह प्रयास करें कि नवदुर्गा से हम शक्ति प्राप्त कर राग, द्वेष, अहम, लोभ आदि आसुरी प्रवृत्तियों का नाश करे और विश्व कल्याण में अपना योगदान दें. इन सब कामनाओं के साथ सबको दशहरे की शुभकामनाएं.
मनोज कुमार पाठक, ई-मेल से
