देश के प्रमुख शहर दिल्ली व मुंबई बदहाली से मुक्त नहीं हो पा रहे तो फिर इसकी उम्मीद करना व्यर्थ है कि अन्य शहर कचरे, गंदगी, बारिश से होने वाले जलभराव, अतिक्रमण, सड़क जाम आदि का सही तरह से सामना कर पाने में सक्षम होंगे. आखिर इस पर किसी को हैरानी क्यों होनी चाहिए कि जानलेवा प्रदूषण से जूझते शहरों में हमारे शहरों की गिनती बढ़ती जा रही है.
नगरीय निकाय, राज्य सरकारें और केंद्र सरकार शहरी विकास के बारे में चाहे जैसे दावे क्यों न करें, हकीकत यही है कि देश के शहर बेतरतीब विकास का पर्याय और बदहाली का गढ़ बनते जा रहे हैं.
यदि नगर नियोजन की घातक अनदेखी का सिलसिला कायम रहा तो देश के बड़े शहर रहने लायक ही नहीं रह जायेंगे. यह किसी त्रासदी से कम नहीं कि समय के साथ शहरों की समस्याएं बढ़ रही हैं और उन्हें ठीक करने के दावे महज जुमले साबित हो रहे हैं.
डाॅ हेमंत कुमार, गोराडीह (भागलपुर)
