World Food Safety Day 2022: 5 साल तक के 67% बच्चे एनीमिया के शिकार, 18% महिलाओं का BMI सामान्य से कम

सरकार ने कोरोना काल में जब हजारों लोगों की नौकरी छूट गयी लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने के लिए योजना शुरू की जो अभी भी जारी है. बावजूद इसके भूख से हमारी जंग जारी है.

World Food Safety Day 2022: आज विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस है. यह दिवस कई मायनों में हमारे लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 201 के वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GLOBAL HUNGER INDEX ) के अनुसार भारत 116 लोगों की सूची में 101वें स्थान पर है. इस मामले में वह अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से पीछे है. वर्ष 2020 में भारत 94वें स्थान पर था. सुप्रीम कोर्ट में देश में भुखमरी से हो रही मौत के मामले में याचिका लंबित है.

वर्ष 2018 में विश्व खाद्य दिवस की शुरुआत हुई थी

खाद्य सुरक्षा से तात्पर्य यह है कि हर व्यक्ति को भोजन उपलब्ध हो. इसके लिए यह सुनिश्चित किया गया है कि हर व्यक्ति को सही मात्रा और पोषण के अनुसार भोजन मिले, जो कई देशों में संभव नहीं हो पाता है. हर व्यक्ति को संतुलित भोजन उपलब्ध हो इसी मिशन के साथ वर्ष 2018 में विश्व खाद्य दिवस की शुरुआत की गयी थी.

देश में सबको खाद्य सुरक्षा उपलब्ध नहीं

लेकिन सच्चाई आज भी यह है कि सरकार की तमाम योजनाओं के बावजूद देश में सबको खाद्य सुरक्षा उपलब्ध नहीं है. सरकार ने कोरोना काल में जब हजारों लोगों की नौकरी छूट गयी लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने के लिए योजना शुरू की जो अभी भी जारी है. बावजूद इसके भूख से हमारी जंग जारी है.

गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का स्तर 52.2 प्रतिशत

एनएफएचएस -5 के अनुसार 6 महीने से पांच साल तक के 67.1 प्रतिशत एनीमिया के शिकार हैं. जिनमें से 64.2 प्रतिशत शहरी और 68.3 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में एनीमिया के शिकार हैं. वहीं 15 से 49 साल की वैसी महिलाएं जो गर्भवती नहीं हैं, उनमें से 57.2 प्रतिशत महिलाएं एनीमिक हैं, जिनमें से 54.1 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में है और 58.7 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में. वहीं 15 से 49 साल की गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का स्तर 52.2 प्रतिशत है, जिनमें से शहरी क्षेत्रों में 45.7 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में 54.3 प्रतिशत है.

15 से 49 साल की 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिक

वहीं अगर सभी महिलाओं की बात करें तो देश में 15 से 49 साल की 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिक हैं, जिनमें से शहरी क्षेत्रों में 53.8 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में 58.5 प्रतिशत है. जबकि 15 से 19 साल की महिलाओं में यह आंकड़ा कुल 59.1 प्रतिशत है. शहरी क्षेत्रों की 56.5 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों की 60.2 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं. बात अगर पुरुषों की करें तो देश में 15 से 49 साल के कुल 25 प्रतिशत एनीमिक हैं, जिनमें शहरी क्षेत्र के 20.4 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्र के 27. 4 प्रतिशत लोग शामिल हैं. वहीं 15 से 19 साल के युवकों में एनीमिया 31.1 प्रतिशत है. जबकि शहरी क्षेत्रों में 25 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 33.9 प्रतिशत युवक एनीमिक हैं.

18.7 प्रतिशत महिलाओं का BMI सामान्य से कम 

बात अगर बीएमआई की करें तो देश में सामान्य से नीचे रहने वाली महिलाओं की संख्या कुल 18.7 प्रतिशत है, जिनमें से 13.2 शहरी क्षेत्रों में हैं और 21.2 ग्रामीण इलाकों में. वहीं अगर बात पुरुषों की करें तो कुल 16.2 पुरुष बीएमआई में सामान्य से नीचे हैं. जिनमें से 13 प्रतिशत शहरी इलाकों में हैं और 17.8 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों में हैं.

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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