अदालत ने बस इतना कहा है कि कोर्ट की सुनवाई का ऑडियो या वीडियो बिना इजाजत सोशल मीडिया या इंटरनेट पर नहीं डाला जा सकता. आप खबर लिख सकते हैं और टीवी या पेपर में बता सकते हैं, लेकिन कोर्ट की कार्यवाही का वीडियो या ऑडिया इस्तेमाल नहीं कर सकते.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए
24 जुलाई को जारी अपने अंतरिम आदेश पर बने भ्रम को दूर करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 31 जुलाई को नया आदेश पारित किया. पीठ ने कहा कि पहले के आदेश को मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. मान्यता प्राप्त समाचार संगठन कानूनी घटनाक्रमों और अदालती फैसलों की जानकारी आम जनता तक पहले की तरह पहुंचा सकते हैं, बस शर्त यह है कि वे रिपोर्टिंग के दौरान सुनवाई की ऑडियो या वीडियो क्लिप का इस्तेमाल नहीं करेंगे.
क्या था 24 जुलाई का अंतरिम आदेश?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 24 जुलाई के आदेश में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट या संबंधित हाई कोर्ट के महापंजीयक की पूर्व अनुमति के बिना न्यायिक कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को सोशल मीडिया या किसी भी डिजिटल मंच पर डालना, एडिट करना, री-पोस्ट करना, पब्लिश करना या उससे पैसे कमाना (मोनेटाइजेशन) पूरी तरह से वर्जित रहेगा.
पत्रकार की याचिका पर केंद्र को नोटिस
यह पूरा मामला पत्रकार हर्षिता ग्रोवर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया. याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने इस विषय को बेहद गंभीर बताया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है.
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