नई दिल्ली से संदीप सावर्ण की रिपोर्ट
जंतर-मंतर पर हुआ छात्र आंदोलन केवल सड़कों पर नहीं लड़ा गया, बल्कि उसकी दूसरी लड़ाई मोबाइल स्क्रीन पर भी चल रही थी. यही वजह रही कि कुछ ही दिनों में दिल्ली का यह प्रदर्शन देशभर के युवाओं का आंदोलन बन गया. सोशल मीडिया ने न केवल लोगों को जोड़ने का काम किया, बल्कि धरनास्थल तक पहुंचने, सूचनाएं साझा करने और अफवाहों से बचने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
सोशल मीडिया बना आंदोलन की ताकत
आंदोलन से जुड़े डिजिटल वालंटियर्स के अनुसार, अलग-अलग राज्यों और विश्वविद्यालयों के लिए व्हाट्सएप और टेलीग्राम ग्रुप बनाए गये थे. इन्हीं समूहों के माध्यम से प्रदर्शन का समय, लाइव लोकेशन, कानूनी सलाह, सुरक्षा संबंधी निर्देश और जरूरी अपडेट लगातार साझा किए जाते थे. इंस्टाग्राम पर रील, पोस्ट और लाइव वीडियो के जरिए जंतर-मंतर की तस्वीरें लाखों लोगों तक पहुंचीं, जबकि एक्स पर हैशटैग के माध्यम से परीक्षा पारदर्शिता और जवाबदेही का मुद्दा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना.
इस आंदोलन में पहले दिन से शामिल रही नताशा ने प्रभात खबर को बताया-
डिजिटल अभियान की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला समर्थन केवल ऑनलाइन नहीं रहा. देश के कई शहरों में छात्रों ने स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन किए और बड़ी संख्या में युवा दिल्ली पहुंचकर धरने में शामिल हुए. कई लोग पहली बार सोशल मीडिया के जरिए जुड़े और फिर सीधे जंतर-मंतर पहुंचे. इसके लिए काफी बेहतर तरीके से 20-20 लोगों की दो टीम बनायी गयी थी, जो लगातार सोशल मीडिया पर दो शिफ्ट में अपडेट्स दे रहे थे.
जमीनी मौजूदगी ने दिलाई विश्वसनीयता
आंदोलन से जुड़े लोगों का मानना है कि सोशल मीडिया केवल एक माध्यम था, जबकि आंदोलन की असली ताकत मैदान में मौजूद छात्र, अभिभावक, डॉक्टर, वकील और स्वयंसेवक थे. आज़मगढ़ से आंदोलन में शामिल होने पहुंचे निखिल यादव ने बताया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने आंदोलन की आवाज को तेजी से फैलाया, लेकिन उसे विश्वसनीयता जंतर-मंतर पर डटे हजारों युवाओं की मौजूदगी से मिली. यही कारण है कि यह आंदोलन डिजिटल और जमीनी भागीदारी के सफल मेल का एक मजबूत उदाहरण बनकर सामने आया.
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