भारत का तिरंगा सिर्फ देश की पहचान नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र के संघर्ष की कहानी भी अपने अंदर समेटे हुए है. आज जिस तिरंगे को हम पूरे गर्व के साथ देखते हैं, वह कई बदलावों से गुजरने के बाद अपने वर्तमान स्वरूप में पहुंचा. तिरंगे के डिजाइन में समय-समय पर बदलाव हुए और आखिरकार 1947 में इसे आज का स्वरूप मिला.
1906 में दिखा पहला तिरंगा
राष्ट्रीय ध्वज के शुरुआती स्वरूपों में से एक 1906 में सामने आया था. इसमें तीन रंगों के साथ सात कमल के फूल, ‘वंदे मातरम्’ लिखा हुआ था. इसके अलावा सूर्य और चंद्र के प्रतीक भी शामिल किए गए थे. यह ध्वज उस दौर में देशभक्ति और आजादी की भावना का प्रतीक बनकर सामने आया.
1907 में बदला ध्वज का स्वरूप
1907 में तिरंगे के डिजाइन में एक और बदलाव हुआ। इसमें केसरिया, पीला और हरा रंग शामिल था. ध्वज पर कमल के फूलों के साथ सूर्य और चंद्र के प्रतीक भी मौजूद थे. यह बदलाव स्वतंत्रता आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के बीच सामने आया.
1917 में यूनियन जैक भी था शामिल
1917 में तिरंगे का एक अलग स्वरूप सामने आया. इसमें लाल और हरे रंग के साथ सात सितारे और यूनियन जैक शामिल था. यह डिजाइन उस समय के राजनीतिक और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े बदलावों को दर्शाता था.
1921 में चरखे ने ली खास जगह
सन् 1921 में पिंगली वेंकैया ने एक नए ध्वज का प्रस्ताव रखा. इस डिजाइन में बीच में चरखे को जगह दी गई. चरखा स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुका था.
1931 में तिरंगे को मिला नया रूप
1931 में केसरिया, सफेद और हरे रंग वाला ध्वज सामने आया. इसके बीच चरखा बनाया गया था. यही डिजाइन आगे चलकर स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के वर्तमान स्वरूप का आधार बना.
22 जुलाई 1947 को अपनाया गया आज का तिरंगा
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने भारत के वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया. इसमें चरखे की जगह अशोक चक्र को शामिल किया गया, जिसमें 24 तीलियां हैं. इसके बाद यही तिरंगा स्वतंत्र भारत की पहचान बन गया.
26 जनवरी 1950 को बना आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ यही तिरंगा भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज बना. आज केसरिया साहस और त्याग, सफेद शांति और सत्य तथा हरा रंग समृद्धि और हरियाली का प्रतीक माना जाता है. अशोक चक्र धर्म, गति और निरंतर प्रगति का संदेश देता है.
