Sabarimala Temple : केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में कहा कि यह मसला धार्मिक आस्था से जुड़ा है, इसलिए यह मामला न्यायिक समीक्षा से बाहर का है. दरअसल सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म की आयु वाली महिलाओं के प्रवेश पर रोक है. यह उम्र सीमा 10 से 50 वर्ष के बीच की है.
हर चीज गरिमा या शारीरिक स्वतंत्रता से जुड़ी नहीं हो सकती
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की ओर से उपस्थित भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 9 सदस्यीय संविधान पीठ के सामने कहा कि यदि कोई प्रथा अवैज्ञानिक है, तो उसका समाधान संसद के पास है. प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं. तुषार मेहता ने कोर्ट के सामने कहा कि हमें हर संप्रदाय की परंपरा का सम्मान करना होगा; हर चीज गरिमा या शारीरिक स्वतंत्रता से जुड़ी नहीं है. अगर मैं मजार या गुरुद्वारा जाता हूं, तो मुझे सिर ढंकना पड़ता है, तो मैं इस बात को अपनी गरिमा और अधिकार से जोड़कर नहीं देख सकता.
हर प्रथा पर रोक उचित नहीं
तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के सामने यह कहा कि हम अदालत से यह स्पष्ट तौर पर कहना चाहते हैं कि वह इस तरह किसी भी प्रथा की समीक्षा ना करे, जिसके बारे में यह कहा जा रहा हो कि वह तर्कसंगत और वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है. यह एक तरह से संवैधानिक बदलाव है, जिसे संविधान में संशोधन के समान माना जाएगा.
2018 में कोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश पर रोक को अवैध बताया था
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को अवैध बताते हुए सु्प्रीम कोर्ट ने 2018 में 4:1 के बहुमत से महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था और इसे अवैध और असंवैधानिक करार दिया था. बाद में 14 नवंबर 2019 को, चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने महिलाओं से भेदभाव के मुद्दे को 3:2 के बहुमत से बड़ी पीठ को भेज दिया था. इस फैसले में सबरीमाला मंदिर के अलावा मस्जिद, दरगाह और पारसियों के पवित्र स्थल में महिलाओं के प्रवेश से संबंधित मसलों पर विचार करने के लिए 9 सदस्यीय बेंच के पास मामला भेज दिया था.
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