मणिपुर : जीत भले ही जाये कांग्रेस, मगर सरकार बनाने के लिए करना होगा जद्दोजहद

इंफाल : मणिपुर विधानसभा चुनाव के परिणाम करीब-करीब सामने आ गये हैं. राज्य की कुल विधानसभा सीटों में 57 सीटों के नतीजे और रुझान से यह साफ हो गया है कि यहां पर एक बार फिर कांग्रेस एक बार फिर जीत के कगार पर है, लेकिन सरकार बनाने के लिए उसे बहुमत सिद्ध करने की […]

इंफाल : मणिपुर विधानसभा चुनाव के परिणाम करीब-करीब सामने आ गये हैं. राज्य की कुल विधानसभा सीटों में 57 सीटों के नतीजे और रुझान से यह साफ हो गया है कि यहां पर एक बार फिर कांग्रेस एक बार फिर जीत के कगार पर है, लेकिन सरकार बनाने के लिए उसे बहुमत सिद्ध करने की भी जरूरत पड़ सकती है. सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को जोड़-तोड़ का सहारा भी लेना पड़ सकता है. इसका कारण यह है कि 60 सदस्यीय विधानसभा में मतदाताओं ने किसी एक दल को बहुमत नहीं दिया है.

चुनाव आयोग की ओर से घोषित नतीजों के अनुसार, राज्य में करीब 21 सीटों पर कांग्रेस जीत हासिल कर पांच सीटों पर बनाये हुई है, जबकि भाजपा 18 सीट जीतकर दो सीट पर बढ़त बनाये हुई है. इन दोनों प्रमुख दलों के अलावा नगा पीपुल्स फ्रंट तीन, लोक जनशक्ति पार्टी एक सीट, नेशनल पीपुल्स पार्टी चार और एक सीट निर्दलीय प्रत्याशी ने भी जीत हासिल की है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि चुनाव आयोग के घोषित नतीजों और रुझान के आधार पर अनुमान लगाया जाये, तो कांग्रेस को इस चुनाव में जीत तो मिली है, पर बहुमत नहीं मिली है. उनका कहना है कि मणिपुर में सरकार बनाने के लिए किसी भी दल को कम से कम 31 विधायकों की दरकार होगी. यदि कांग्रेस बढ़त वाली पांच सीटों पर जीत हासिल कर भी लेती है, तो सरकार बनाने से वह पांच कदम दूर ही रहेगी. इसके लिए उसे अन्य दूसरे दलों से सहयोग लेना ही पड़ेगा.

वहीं दूसरी ओर भाजपा की स्थिति पर नजर डालें, तो इस साल के चुनाव में भाजपा प्रदर्शन वर्ष 2012 के चुनाव से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है. 2012 के चुनाव में भाजपा 19 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, जिसमें उसे जीत हासिल नहीं हुई थी. वहीं, कांग्रेस 60 सीटों पर चुनाव लड़कर 42 सीटों पर अपना कब्जा जमाया था. इस लिहाज से इस बार के चुनाव पर गौर करेंगे, तो यह साफ हो जायेगा कि भाजपा ने इस बार के चुनाव में कांग्रेस को पिछले साल के अनुपात में उसकी शक्ति को समेटकर आधे पर कर दिया है और आधे पर उसने खुद कब्जा जमा लिया है.

हालांकि, इस बार के चुनाव में पीआरजेए की ओर से राज्य में अफस्पा के विरोध में करीब डेढ़ दशक तक आमरण अनशन करने वाली इरोम चानू शर्मिला ने भी ताल ठोंका था, लेकिन उन्हें प्रदेश के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के उम्मीदवार ओकराम इबोबी सिंह के हाथों हार का सामना करना पड़ा. स्थिति यह इस बार के चुनाव में इरोम को कुल 90 मत ही प्राप्त हुए. हालांकि, अंग्रेजी के एक समाचार चैनल को दिये साक्षात्कार में उन्होंने अपनी हार को मतगणना के पहले ही स्वीकार कर लिया था. उसमें उन्होंने कहा था कि यहां के मतदाताओं का माइंड सेट है. नतीजों और जीत के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है.

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