स्कूल बना खंडहर, अब नहीं गूंजते संस्कृत के श्लोक

आरा. जहां कभी संस्कृत के श्लोक गूंजा करते थे. जहां संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए ज्ञान की धारा प्रवाहित हुआ करती थी. आज वहां विरानगी छायी है. संस्कृत विद्यालय के

आरा. जहां कभी संस्कृत के श्लोक गूंजा करते थे. जहां संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए ज्ञान की धारा प्रवाहित हुआ करती थी. आज वहां विरानगी छायी है. संस्कृत विद्यालय के भवन खंडहर हो चुके हैं. अब यहां संस्कृत के श्लोक की आवाज नहीं सुनायी देती है. सुनायी देती हैं तो बस अतीत की यादें. संस्कृत पढ़ने की लालसा रखने वाले जिले के विद्यार्थियों को अब इसकी सुविधा नहीं मिल रही है. इसमें लगभग एक एकड़ जमीन थी.पर अब अतिक्रमण का शिकार हो चुका है. संस्कृत विद्यालय की जमीन पर जमीन के धंधेबाजों की दृष्टि है. इसको बेचने के लिए प्रयास किया जा रहा है. संस्कृत है सबसें पुरानी भाषा संस्कृत देश की सबसे पुरानी भाषा है.अपनी संस्कृति को जीवंत रखने को लेकर सरकार ने संस्कृत विद्यालयों की परिकल्पना की, जहां शिक्षार्थी संस्कृत का अध्ययन करेंगे.नासा आदि से भी साबित हो चुका है कि कंप्यूटर के लिए भी सर्वोपयोगी भाषा संस्कृत ही है.पर विगत 25 से 30 वर्षों से संस्कृत के प्रति के उदासीन रवैया के कारण संस्कृत विद्यालयों के विकास नहीं हो पाया. इतना ही नहीं इनका अस्तित्व भी मिटते जा रहा है. अस्तित्व बचेगा भी कैसे जब बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड स्वयं ही बीमार है. बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री ने शुरू किया था संस्कृत विद्यालय बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ श्री कृष्ण सिंह ने 1953 से 1956 के बीच 16 राजकीय संस्कृत विद्यालयों की स्थापना की थी.इनमें से पांच झारखंड में चले गए.बिहार में शेष बचे 11 संस्कृत विद्यालयों में आरा का राजकीय संस्कृत विद्यालय भी शाम आरा से नरेंद्र प्रसाद सिंह की रिपोर्ट

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