मुसाबनी. मुसाबनी की बाबू लाइन दुर्गा पूजा समिति वर्ष 1937 से दुर्गा पूजा का आयोजन कर रही है. शुरुआत एक अनोखी घटना से हुई थी. वर्ष 1936 में आइसीसी ताम्र खदानों के कर्मचारी अपने परिवारों के साथ ट्रक से मऊभंडार दुर्गा पूजा देखने गये थे. लौटते समय रास्ते में हाथियों का झुंड आ गया और भक्तों ने मां दुर्गा से रक्षा की प्रार्थना की. कुछ देर बाद हाथियों का झुंड जंगल की ओर लौट गया. इसके बाद भक्तों ने अगले वर्ष मुसाबनी में ही दुर्गा पूजा शुरू करने का प्रण लिया और 1937 में यहां पूजा की परंपरा शुरू हुई.
स्थापना और प्रारंभिक सहयोग
बाबू लाइन दुर्गा पूजा समिति के पहले अध्यक्ष वकेश भट्टाचार्ज, सचिव गौरीपद बनर्जी और कोषाध्यक्ष विभूति भूषण नामाता थे. समिति को पूजा शुरू करने में आइसीसी कंपनी का सहयोग मिला था. तब से यह पूजा निरंतर पारंपरिक ढंग से आयोजित होती आ रही है.
एक चाला मूर्ति की विशेषता
बाबू लाइन दुर्गा पूजा समिति में मां दुर्गा की प्रतिमा पारंपरिक एक चाला मूर्ति (जहां मां दुर्गा के साथ सभी देवी-देवता एक साथ स्थापित होते हैं) के रूप में बनायी जाती है. कुछ वर्ष पहले समिति ने अलग-अलग मूर्तियां बनाने का प्रयास किया था, लेकिन पूजा के दौरान अष्टमी की रात पंडाल में अचानक आग लग गयी और सब जलकर खाक हो गया. इस घटना के बाद समिति ने हमेशा की तरह पारंपरिक एक चाला मूर्ति की परंपरा को जारी रखने का निर्णय लिया. इस वर्ष एक चाला मूर्ति का निर्माण उपरबांधा के मूर्तिकार गोविंद भकत के नेतृत्व में मूर्तिकार दल कर रहा है.
वर्तमान समिति
इस वर्ष बाबू लाइन दुर्गा पूजा समिति का संचालन अध्यक्ष शुभेंदु सरकार, उपाध्यक्ष सुभाष दाश, सचिव वापी भद्र और कोषाध्यक्ष शिबू भकत कर रहे हैं. समिति के सदस्य जोर-शोर से पूजा की तैयारियों में जुटे हुए हैं.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
