कदवा फागुन का महीना आते ही लोगों पर होली की खुमारी चढ़ती नजर आने लगती है. लेकिन बदलते परिवेश में पहले के वनिस्पत फागुन का खुमार व रंगों का उमंग फीकी पड़ती नजर आ रही है. प्रखंड क्षेत्र दुर्गागंज ग्राम सहित कई ग्रामीण क्षेत्रों में होली में फागुन गायन की परंपरा आज भी जीवित है. इस क्षेत्रों में होली के कुछ दिनों पहले से ही गायन तथा नृत्य मंडली फाग गायन का अभ्यास करने में जुट जाते है. टोली में बच्चे बूढ़े और नौजवान सभी लोग शामिल होते है. यहां होली गाने वालों की कई मंडली है. जो होली के अवसर पर अलग- अलग समूहों में गांव के अलग- अलग दरवाजे पर जाकर फागुन का नाच गाना करते है. इसमें कोई कृष्ण तो कोई राधा बनकर होली के लोक गीत होलिया खेलन जइबे राज बरिया मैं तो होलिया, होली में दिल मिल जाते है जैसे गायन एवं नृत्य कर लोगों के मन मोह लेते है. बूढ़े बुजुर्ग तरह तरह के जोगीरा गा कर रंग जमा देते है. इस परंपरा को सहेजने में गांव के बुजुर्गो का अहम भूमिका है. जो इस परंपरा को जीवित रखे हुए है. इस पारंपरिक फाग गायन के आयोजन से आपसी भाई चारे एवं सौहार्द का संदेश दिया जाता है. ऐसे आयोजन से सामाजिक समरसता को भी बल मिलता है.
गांव में होली के गूंज रहे गीत, समूहों पर जुट गा रहे फगुवा
गांव में होली के गूंज रहे गीत, समूहों पर जुट गा रहे फगुवा
