Hajipur News : वैशाली में दो घरानों पटेल और शाही परिवार के सदस्यों का रहा है दबदबा

पटेढी बेलसर. वैशाली विधानसभा क्षेत्र की राजनीति दशकों से दो प्रमुख राजनीतिक घरानों शाही परिवार और पटेल परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है. आजादी के बाद जब यह क्षेत्र

पटेढी बेलसर. वैशाली विधानसभा क्षेत्र की राजनीति दशकों से दो प्रमुख राजनीतिक घरानों शाही परिवार और पटेल परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है. आजादी के बाद जब यह क्षेत्र लालगंज विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा था, तब इसकी राजनीतिक स्थिति कुछ और थी, लेकिन 1967 के परिसीमन के बाद वैशाली विधानसभा अस्तित्व में आया और इसी के साथ यहां की राजनीति ने नयी दिशा पकड़ी. लगभग छह दशकों में इस सीट पर 45 वर्षों तक शाही और पटेल परिवारों का कब्जा रहा है. अब तक केवल तीन बार ही ऐसे उम्मीदवार विजयी हो पाये हैं जो इन दोनों राजनीतिक परिवारों से नहीं रहे. 1977 में नागेंद्र प्रसाद सिंह, 1995 में राजकिशोर सिंह और 2015 में राजकिशोर सिन्हा ने इन परिवारों के वर्चस्व को तोड़ा. वैशाली सीट के पहले विधायक स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. ललितेश्वर प्रसाद शाही रहे, जिन्होंने 1967 और 1969 में लगातार दो बार जीत दर्ज की. इसके बाद उनके बेटे स्व. हेमंत शाही और पुत्रवधू वीणा शाही ने भी इस राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया. वीणा शाही ने मंत्री पद पर रहते हुए भी क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनायी. दूसरी ओर स्वतंत्रता सेनानी स्व. गुलजार पटेल के पुत्र वृषिण पटेल ने 1980 में पहली बार जीत हासिल की और अब तक छह बार इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. वृषिण पटेल के भतीजे सिद्धार्थ पटेल वर्तमान में जदयू से विधायक हैं. हालांकि 2015 के बाद दोनों की राजनीतिक राहें अलग हो चुकी हैं. वर्ष 2005 से वैशाली सीट पर जदयू का कब्जा कायम है. चेहरों में बदलाव होते रहे, लेकिन पार्टी की पकड़ मजबूत बनी रही. हालांकि 2015 में वृषिण पटेल ने जदयू छोड़कर ‘हम’ पार्टी का दामन थामा था, जिसके बाद से वे सत्ता की मुख्यधारा से धीरे-धीरे दूर हो गये. अब एक बार फिर वृषिण पटेल निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर चुके हैं.

पटेल परिवार से चाचा- भतीजा हो सकते हैं चुनावी मैदान में

इस बार चुनाव दिलचस्प होने वाला है क्योंकि वे अपने ही भतीजे और वर्तमान विधायक सिद्धार्थ पटेल के खिलाफ मैदान में हैं. वहीं राजद से अजय कुशवाह और कांग्रेस से इंजीनियर संजीव सिंह भी मैदान में हैं. चर्चाओं के अनुसार, शाही परिवार की वीणा शाही भी सक्रिय राजनीति में वापसी कर सकती हैं, जिससे मुकाबला और भी त्रिकोणीय व जटिल हो जायेगा. इस बार वैशाली में जनसुराज पार्टी की भी उपस्थिति देखी जा रही है. यह पार्टी वोटों के बिखराव में बड़ी भूमिका निभा सकती है. वैशाली सीट को जदयू की परंपरागत सीट माना जाता है, लेकिन इस बार समीकरण काफी बदलते दिख रहे हैं. वृषिण पटेल क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं. लोगों से पुराने संबंधों के आधार पर समर्थन मांग रहे हैं. कुल मिलाकर वैशाली विधानसभा का यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों की टक्कर नहीं, बल्कि पारिवारिक राजनीतिक टकराव का मंच बन चुका है. चाचा बनाम भतीजा की यह जंग न केवल रोचक होगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि क्या शाही और पटेल परिवारों के वर्चस्व को कोई नया चेहरा चुनौती दे पाएगा या नहीं. छह दशक बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वैशाली की राजनीति में किसी नये परिवार को उभरने का मौका मिलेगा या फिर सत्ता की बागडोर एक बार फिर पुराने हाथों में ही जायेगी.

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Author: GOPAL KUMAR ROY

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