मधुर वाणी एकता के सूत्र में बांधती है : मुनिश्री विशल्यसागर

मुनिश्री ने कहा, मधुर वाणी एकता के सूत्र में बांधती है

आरा.

श्री दिगंबर जैन चंद्रप्रभु मंदिर में विराजमान मुनिश्री108 विशल्यसागर जी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि मधुर वाणी एकता के सूत्र में बांधती है. कटु वाणी समाज को, परिवार के मैत्री को तोड़ देती है. मनुष्य को अपने वक्तव्य पर लगाम लगानी चाहिए. क्या बोल रहा हूं? क्यों बोल रहा हूं? इसका परिणाम क्या होगा? सब विचारना चाहिए. इसलिए आप लोगों को चौके तक में वाणी संयम रखने को कहा जाता है, समझाया जाता है.

चौके में आम काट लो, सेव काट लो ये शब्द न बोले. ””आम संवार लो”” सेव बना लो कहा जाता है. काट लो शब्द हिंसा का घोतक है. शब्द सजाना अहिंसा का द्योतक है. वाणी संयम के बारे में सभी लेखक, कवि, विद्वान, भगवान ने बहुत जोर दिया है. कबीर दास जी ने कहा है- मधुर वचन है औषधि, कटु वचन है तौर श्रवण द्वार से संचरे, साले सकल शरीर. मीठी वाणी दवा एवं कटु वाणी तीर है. शब्द कान से प्रवेश कर दिल, शरीर दोनों में निरंतर चुभते रहते हैं. एक घर में अगर वाणी संयम हो-सास बहु से, पिता-पुत्र से देवरानी जेठानी से, नौकर-मालिक से, ग्राहक-दुकानदार से, ऑफिसर-क्लर्क से, नेता-जनता से, सन्त-मक्त से मीठे वचन बोलना प्रारंभ कर दे तो घर, मुहल्ला, नगर, देश को स्वर्ग होते क्षण भर भी नहीं लगेगा. मनुष्य करे कम, सुने अधिक तो सारे संताप समाप्त हो जाये. कहा भी गया है. बोलो कम सुनो अधिक, ये है परम विवेक. इसलिए विधि ने दिये, दोय कान मुख एक. मुलायम जीभ जब कठोर वाक्य निकालती है तो कठोर बत्तीसी को भी बाहर करा देती है. शब्द संभाले बोलिए, शब्द के हाथ न पांव. एक शब्द करे औषधि, एक शब्द करें घाव. शब्द वही है जो एक भ्रम को जगाता है, एक भ्रम को फैलाता है, इसलिए भगवान महावीर ने कहा-संयम का पालन करने वाले वाणी संयम रखे. वहीं मीडिया प्रभारी निलेश कुमार जैन ने बताया कि पर्युषण महापर्व जैन समुदाय का आत्मा शुद्धि, आत्मचिंतन और अहिंसा का एक पवित्र पर्व है, जिसमें भक्त उपवास, ध्यान, स्वाध्याय, और क्षमा याचना करते हैं. इसका उद्देश्य क्रोध, अहंकार, और लोभ जैसे विकारों को त्याग कर करुणा, संयम, और उत्तम क्षमा जैसे मानवीय मूल्यों को अपनाना है. दिगंबर जैन समुदाय भाद्रपद शुक्ल दशमी को सुगन्ध दशमी या धूप दशमी मनाया जाता है, जिसे उत्तम संयम धर्म का दिन भी कहा जाता है. इस पर्व के अवसर पर जैन मंदिर में भगवान के चरणों में धूप अर्पित की जाती है, जिससे वातावरण सुगंधित होता है और बुराइयों को दूर करने की प्रार्थना की जाती है. उन्होंने बताया कि सोमवार को भगवान मुनिसुब्रतनाथ मंदिर में यक्ष-यक्षणी की प्राण-प्रतिष्ठा, स्थापना की वर्षगांठ के अवसर पर बहु रूपाणी देवी मां का भव्य शृंगार एवं गोद भराई का कार्यक्रम संपन्न हुआ.

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Author: DEVENDRA DUBEY

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