Jharkhand Viral Song: रांची में विधानसभा के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्र नारे लगा रहे थे, तभी माहौल में एक पुराना गीत गूंजने लगा—‘गांव छोड़ब नहीं...’. विरोध कर रहे युवाओं के सुर में सुर मिलाते इस गीत ने वहां मौजूद हर किसी का ध्यान खींच लिया. सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुआ तो सवाल उठने लगा कि आखिर झारखंड के इस पुराने जनगीत को आज के प्रदर्शन के बीच क्यों याद किया गया? इस गीत की कहानी सिर्फ एक धुन की नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन और अपनी माटी से जुड़े संघर्ष की है.
सोशल मीडिया पर पुराने पेप्सी विज्ञापन के साथ झारखंड का चर्चित जनगीत ‘गांव छोड़ब नहीं’ एक बार फिर चर्चा में है. करीब दो दशक पुराना यह गीत आज भी झारखंड के आंदोलनों में सुनाई देता है.
झारखंड में आंदोलन सिर्फ नारों से नहीं होते. यहां गीत भी संघर्ष की आवाज बनते हैं. ‘गांव छोड़ब नहीं’ ऐसा ही जनगीत है, जिसने अपनी मिट्टी, जंगल और गांव को बचाने की लड़ाई को शब्द दिए.
पेप्सी-कोला वाली लाइन क्यों है खास?
गीत का सबसे चर्चित हिस्सा पानी और नदियों से जुड़ा है. इसमें पेप्सी-कोला और बोतलबंद पानी का जिक्र करते हुए सवाल उठाया गया है कि जब प्राकृतिक जलस्रोत संकट में हैं, तो आम आदमी अपनी प्यास कैसे बुझाएगा.
सोशल मीडिया पर इसी हिस्से को पुराने पेप्सी विज्ञापन के विजुअल के साथ जोड़कर दिखाया गया है. एक तरफ चमकता हुआ विज्ञापन, दूसरी तरफ पानी और प्राकृतिक संसाधनों के लिए संघर्ष. दोनों को साथ देखने पर यह वीडियो एक तीखा विरोधाभास पैदा करता है.
एक तरफ बाजार की चमक है, दूसरी तरफ उस पानी की तलाश, जो कभी गांव की नदियों और झरनों से मिलता था.
‘गांव छोड़ब नहीं’ का मतलब क्या है?
गीत की मूल भावना बेहद सीधी है—गांव नहीं छोड़ेंगे, जंगल नहीं छोड़ेंगे, अपनी माटी नहीं छोड़ेंगे और संघर्ष नहीं छोड़ेंगे.
यहां गांव सिर्फ रहने की जगह नहीं है. जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं है और जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं है. इनके साथ आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, रोजगार और पहचान जुड़ी हुई है.
इसीलिए यह गीत विस्थापन के खिलाफ एक भावनात्मक आवाज बन जाता है.
झारखंड आंदोलन से जुड़ा है गीत
लोकगायक मधु मंसूरी हंसमुख की आवाज में लोकप्रिय हुआ यह गीत झारखंड के आंदोलनकारी सांस्कृतिक परिदृश्य का अहम हिस्सा रहा है. मधु मंसूरी के गीतों ने झारखंड आंदोलन के दौरान लोगों को जोड़ने और आदिवासी संस्कृति एवं पहचान के सवालों को आवाज देने का काम किया.
उनके गीतों में जल-जंगल-जमीन, आदिवासी संस्कृति और अपनी माटी से जुड़े रहने की भावना बार-बार दिखाई देती है.
विकास के मॉडल पर भी सवाल
‘गांव छोड़ब नहीं’ सिर्फ भावनाओं का गीत नहीं है. इसके भीतर विकास के उस मॉडल पर सवाल भी हैं, जिसमें बड़े प्रोजेक्ट, खनन, बांध और औद्योगिक विस्तार के बीच स्थानीय लोगों के विस्थापन का मुद्दा सामने आता है.
गीत पूछता है कि अगर विकास की कीमत किसी के गांव, जंगल और जमीन को छोड़ना है, तो उस विकास में उस व्यक्ति की जगह कहां है?
यही सवाल इसे आज भी प्रासंगिक बनाता है.
कौन हैं मधु मंसूरी हंसमुख?
मधु मंसूरी हंसमुख झारखंड के प्रसिद्ध नागपुरी लोकगायक और गीतकार हैं. उन्होंने कम उम्र में मंच पर गाना शुरू किया और बाद में नागपुरी संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई.
झारखंड की भाषा, संस्कृति और आंदोलन को अपनी आवाज देने वाले मधु मंसूरी को वर्ष 2020 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया.
करीब दो दशक बाद भी क्यों नहीं पुराना हुआ गीत?
झारखंड अलग राज्य बन गया, लेकिन जल-जंगल-जमीन, विस्थापन और स्थानीय पहचान से जुड़े सवाल खत्म नहीं हुए. यही वजह है कि ‘गांव छोड़ब नाहीं’ अलग-अलग आंदोलनों में आज भी सुनाई देता है.
सोशल मीडिया ने अब इस पुराने जनगीत को नए अंदाज में नई पीढ़ी तक पहुंचा दिया है.
पुराने पेप्सी विज्ञापन और इस गीत को एक साथ रखने वाली रील इसलिए भी लोगों का ध्यान खींच रही है, क्योंकि यह महज दो वीडियो क्लिप का मेल नहीं है.
यह एक तरफ उपभोग की चमक और दूसरी तरफ अपनी मिट्टी बचाने की जिद को आमने-सामने खड़ा करती है.
और शायद यही वजह है कि इतने साल बाद भी इस गीत की आवाज कमजोर नहीं पड़ी, ‘गांव छोड़ब नहीं... माय-माटी छोड़ब नहीं...’
