हाथी हमारे बच्चों की तरह हैं, पालक मां की तरह करती हूं देखभाल,The Elephant Whisperers फेम बेल्ली ने कही ये बात

बेल्ली ने कहा कि उन्हें पुरस्कार के बारे में नहीं पता था, लेकिन वह उन्हें लगातार मिल रही शुभकामनाओं को लेकर उत्साहित थीं. उन्होंने कहा, ''मैंने ऐसे कई नन्हें हाथियों को अपने बच्चों की तरह पाला है, पालक मां की तरह उनकी देखभाल की है''.

ऑस्कर 2023 में ‘द एलीफेंट व्हिस्परर्स’ ने इतिहास रच दिया. शॉर्ट फीचर ड्रॉक्यमेंट्री ने वो कर दिखाया, जो लगान और मदर इंडिया नहीं कर सकीं. अब ड्रॉक्यमेंट्री की प्रमुख महिला किरदार निभाने वाली बेल्ली ने कहा कि “मैं ऑस्कर पुरस्कार के बारे में नहीं जानती, लेकिन मुझे बेसहारा युवा हाथियों की ‘वलारप्पु थाई’ (पालक मां) बनना पसंद है.” उन्होंने कहा, “हाथी हमारे बच्चों की तरह हैं, हम मां खो चुके बेसहारा हाथियों के लिए इसे सेवा के रूप में देखते हैं.”

ड्रॉक्यमेंट्री की एक्ट्रेस ने कही ये बात

बेल्ली ने कहा कि उन्हें पुरस्कार के बारे में नहीं पता था, लेकिन वह उन्हें लगातार मिल रही शुभकामनाओं को लेकर उत्साहित थीं. बेल्ली ने पीटीआई-भाषा से कहा, मैंने ऐसे कई नन्हें हाथियों को अपने बच्चों की तरह पाला है, पालक मां की तरह उनकी देखभाल की है, खासतौर पर उन हाथियों के बच्चों को जो अपनी मां को जंगल में खो देते हैं.” एक महावत परिवार से आने वाले बेल्ली ने आगे कहा, “यह (हाथियों की सेवा करना) हमारे खून में है, क्योंकि हमारे पूर्वज भी उसी तरह काम कर रहे थे, जैसा कि हमारी दादी ने बताया था”.

अवॉर्ड पाकर खुश हैं बेल्ली

ड्रॉक्यमेंट्री के ऑस्कर जीतने पर बेल्ली ने कहा, “मुझे पुरस्कार के बारे में नहीं पता. लेकिन मैं बहुत खुश और उत्साहित हूं, क्योंकि मुझे खूब बधाइयां मिल रही हैं.” वृतचित्र में उनके ‘हीरो और पति’ बोमन के बारे में पूछे जाने पर, उन्होंने कहा कि वह एक हाथी को लाने के लिए सलेम गए थे, जिसे कुछ गंभीर समस्या थी और फिर वह उनकी सेवा के लिए बेसब्र थे. दंपति नीलगिरी जिले के मुदुमलाई टाइगर रिजर्व में थेपक्काडू हाथी शिविर में महावत के रूप में काम करते हैं और हाथी के बच्चों की देखभाल करते हैं.

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ये है ड्रॉक्यमेंट्री की कहानी

कार्तिकी गोंजाल्विज द्वारा निर्देशित ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ में हाथी के दो बेसहारा बच्चे रघु और अमू और उनकी देखभाल करने वाले बोमन और बेल्ली के बीच अटूट संबंध को दिखाया गया है. इस बीच, ‘नीलगिरी आदिवासी वेलफेयर एसोसिएशन’ के सचिव अलवास ने इस पुरस्कार को आदिवासियों के पारंपरिक पेशे को मान्यता करार दिया.

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