सोशल मीडिया पर ऐश्वर्या राय बच्चन का एक पुराना इंटरव्यू इन दिनों फिर वायरल हो रहा है, जिसमें वह बताती हैं कि उन्होंने फराह खान की ‘हैप्पी न्यू ईयर’ क्यों छोड़ दी थी. वजह सिर्फ फिल्म या किरदार नहीं थी, बल्कि पति अभिषेक बच्चन के साथ स्क्रीन पर उनकी भूमिका से जुड़ी थी. ऐश्वर्या आज भी अपनी खूबसूरती, अभिनय और मजबूत पहचान के लिए जानी जाती हैं, लेकिन उनकी यह पुरानी सोच एक महिला के तौर पर मुझे आज भी सवाल करने पर मजबूर करती है.
सालों पहले ऐश्वर्या ने फराह खान की फिल्म ‘हैप्पी न्यू ईयर’ इसलिए करने से मना कर दिया था क्योंकि फिल्म में वह लीड रोल में थीं, जबकि उनके पति अभिषेक बच्चन सेकेंड लीड में होते. ऐश्वर्या को लगा कि दोनों एक ही फिल्म में हों और उनकी भूमिकाएं बराबर न हों, तो स्थिति अजीब हो जाएगी.
यहीं से मेरा सवाल शुरू होता है.
'Sorry Aishwarya, लेकिन इस बार आपसे एक महिला के तौर पर मैं सहमत नहीं हूं.'
क्योंकि आप सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं हैं. आप उस मुकाम पर खड़ी महिला हैं, जिसे देश की लाखों लड़कियां देखती हैं. और जब आपके जैसी मजबूत, सफल और आत्मनिर्भर महिला यह सोच सामने रखती है कि पति के मुकाबले पत्नी की भूमिका बड़ी हो तो स्थिति ‘awkward’ हो सकती है, तो इसका असर सिर्फ आपकी जिंदगी तक सीमित नहीं रहता.
यह सोच बहुत दूर तक जाती है.
पत्नी को पति से ज्यादा सफल होने में दिक्कत क्यों हो?
सोचिए, अगर कहानी उलटी होती.
अगर अभिषेक लीड रोल में होते और ऐश्वर्या सेकेंड लीड में होतीं, तो क्या हम इसे उतना ही ‘awkward’ मानते?
शायद नहीं...
हम तो कहते- वाह, एक ही फिल्म में पति-पत्नी साथ काम कर रहे हैं.
लेकिन जैसे ही पत्नी की भूमिका पति से बड़ी होने की बात आती है, वहां एक अदृश्य असहजता पैदा हो जाती है.
क्यों?
क्योंकि सदियों से हमने पुरुष को परिवार का मुख्य चेहरा और महिला को उसके साथ खड़ी रहने वाली भूमिका में देखने की आदत बना ली है.
पुरुष आगे बढ़े तो परिवार की 'उपलब्धि'.
महिला आगे बढ़े तो सवाल- 'पति से ज्यादा तो नहीं?'
यही तो patriarchy का सबसे खूबसूरत और खतरनाक रूप है. वह हमेशा आदेश देकर नहीं आती. कई बार वह हमारी अपनी सोच बनकर हमारे भीतर बैठी होती है.
शायद अभिषेक ने कभी कुछ कहा भी नहीं होगा
यहां एक बात साफ होनी चाहिए. ऐश्वर्या के बयान से यह साबित नहीं होता कि अभिषेक ने उनसे फिल्म छोड़ने को कहा था या उन्हें अपनी पत्नी का ज्यादा बड़ा रोल पसंद नहीं आता.
हो सकता है यह ऐश्वर्या का अपना फैसला रहा हो. हो सकता है उन्होंने अपने रिश्ते की सहजता को महत्व दिया हो.
लेकिन सवाल फिर भी रहेगा-
क्या रिश्ते की सहजता बनाए रखने की जिम्मेदारी हमेशा महिला की महत्वाकांक्षा कम करके पूरी होनी चाहिए?
क्या पति-पत्नी का रिश्ता इतना कमजोर होता है कि पत्नी की बड़ी भूमिका पति के आत्मविश्वास को चोट पहुंचा दे?
और अगर ऐसा नहीं है, तो फिर महिला खुद यह डर क्यों महसूस करे?
आपकी एक फिल्म नहीं, एक सोच मायने रखती है
‘हैप्पी न्यू ईयर’ कोई ऐसी फिल्म नहीं थी जिसके बिना ऐश्वर्या का करियर अधूरा रह जाता. शायद उन्होंने सही फैसला लिया हो, शायद नहीं. यह बात आज तय करना भी मुश्किल है.
लेकिन यहां फिल्म मुद्दा नहीं है.
मुद्दा उस सोच का है जो एक महिला को यह सिखाती है कि अपने पति से ज्यादा चमकना रिश्ते के लिए ठीक नहीं.
और इसीलिए ऐश्वर्या से मेरी शिकायत थोड़ी ज्यादा है.
क्योंकि अगर यही सोच कोई आम महिला रखती है, तो शायद हम कह दें- उसकी मजबूरी होगी.
लेकिन जब देश की सबसे सफल और प्रभावशाली महिलाओं में से एक महिला ऐसा फैसला लेती है, तो वह अनजाने में एक उदाहरण भी बनाती है.
और उदाहरणों की ताकत बहुत बड़ी होती है.
उस छोटे से गांव की लड़की के बारे में सोचिए
मान लीजिए झारखंड, बिहार, राजस्थान या उत्तर प्रदेश के किसी छोटे से गांव की एक लड़की पढ़-लिखकर आगे बढ़ना चाहती है.
वह अपने पति से ज्यादा कमाना चाहती है.
वह अपने पति से बड़ी अधिकारी बनना चाहती है.
वह चाहती है कि उसकी पहचान उसके पति के नाम से नहीं, उसके अपने काम से बने.
लेकिन उसके घर में कोई उससे कहता है-
“पति से ज्यादा आगे निकलने की कोशिश मत करो. घर में पति की इज्जत सबसे ऊपर होनी चाहिए.”
वह लड़की अगर ऐश्वर्या जैसी किसी महिला को देखेगी, तो उसके मन में क्या जाएगा?
कि शायद सचमुच पत्नी को पति से आगे नहीं निकलना चाहिए.
कि शायद पति से ज्यादा सफल होना रिश्ते के लिए खतरा है.
कि शायद अपने सपनों को थोड़ा पीछे करना ही ‘अच्छी पत्नी’ होने की निशानी है.
यही डरावना हिस्सा है.
हमें महिलाओं से त्याग की उम्मीद कब तक रहेगी?
हमारी फिल्मों ने हमेशा त्याग करने वाली महिलाओं को महान बताया है.
पति के लिए करियर छोड़ दो- महान.
परिवार के लिए सपना छोड़ दो- महान.
पति की सफलता के लिए अपनी सफलता पीछे कर दो- महान.
लेकिन अगर कोई महिला कह दे कि-
“नहीं, मैं भी आगे बढ़ूंगी. मेरे पति की सफलता मेरी सीमा नहीं है.”
तो उसे महत्वाकांक्षी, स्वार्थी और परिवार की परवाह न करने वाली कह दिया जाता है.
हमें इस narrative को बदलना होगा.
क्योंकि पति की सफलता पत्नी की हार नहीं है.
और पत्नी की सफलता पति की हार नहीं है.
एक महिला की ऊंचाई किसी पुरुष की ऊंचाई कम नहीं करती.
इसलिए, Sorry Aishwarya...
आप बेहतरीन अभिनेत्री हैं. आप बेहद सफल महिला हैं. आपने अपने दम पर एक ऐसी पहचान बनाई है, जिसे कोई आपसे छीन नहीं सकता.
लेकिन इस एक मामले में, एक महिला के नजरिए से मुझे लगता है कि आप एक बेहतर उदाहरण पेश कर सकती थीं.
आप फिल्म कर सकती थीं.
आप लीड हो सकती थीं.
अभिषेक सेकेंड लीड हो सकते थे.
और दोनों मिलकर दुनिया को यह बता सकते थे कि पति-पत्नी का रिश्ता किसी स्क्रीन क्रेडिट से बड़ा होता है.
कि पत्नी का ज्यादा चमकना पति का अपमान नहीं है.
'कि पति की पहचान मजबूत करने के लिए पत्नी को अपनी पहचान छोटी करने की जरूरत नहीं है.'
और सबसे जरूरी-
‘कि किसी महिला को अपने पति की सुविधा के लिए अपने सपनों की सीमा तय नहीं करनी चाहिए.’
क्योंकि जब आप जैसी महिला अपनी रोशनी थोड़ी कम करती है, तो हो सकता है आपके लिए वह सिर्फ एक निजी फैसला हो.
लेकिन किसी छोटे शहर या गांव में बैठी लड़की के लिए वह एक संदेश बन सकता है-
“शायद मुझे भी इतना आगे नहीं बढ़ना चाहिए कि मेरे पति से ज्यादा आगे निकल जाऊं.”
और यही वह संदेश है जिसे हमें बदलना है.
'महिलाओं को बराबरी चाहिए, पति से आगे निकलने की आजादी भी. और सबसे बढ़कर- उन्हें अपनी चमक कम करने की जरूरत न पड़े, इसकी आजादी चाहिए.'
