फिल्म- धमाल 4
निर्माता- अजय देवगन फिल्म्स
निर्देशक - इंद्र कुमार कलाकार - अजय देवगन,अरशद वारसी, जावेद जाफरी,रवि किशन,रितेश देशमुख,अंजलि,संजय मिश्रा,संजीदा शेख और अन्य
प्लेटफार्म -सिनेमाघर
रेटिंग -दो
हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय फ्रेंचाइजी फ़िल्मों में धमाल फ्रेंचाइजी का अक्सर जिक्र आता रहा है. मल्टीस्टारर साफ़ सुथरी कॉमेडी फ़िल्म इस फ्रेंचाइज़ी की खासियत रही है .२००७ से इस फ्रेंचाइजी की शुरुआत हुई थी. धमाल,डबल धमाल और टोटल धमाल के सात सालों बाद धमाल 4 ने दस्तक दी है लेकिन यह इस फ्रेंचाइजी की सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई है. ख़ज़ाने को खोजने वाली इस कहानी में इस बार कहानी और कॉमेडी को खोजने की जो नौबत आ गई है .
जानें क्या है कहानी?
ये है कहानी धमाल का मतलब ख़ज़ाने को खोजने की कहानी है. धमाल के पहले पार्ट में डब्ल्यू से शुरू हुई ख़ज़ाने की कहानी धमाल 4 में एम के निशान तक पहुंच गई है. फ़िल्म की शुरुआत में एनिमेशन के ज़रिए शैतान सिंह के खज़ाने के बारे में बताया जाता है.कहानी जल्द ही ऐसे मोड़ पर पहुंच जाती है .जहां एक आदमी मरने से पहले बता देता है कि खज़ाना जनकपुर जेटी के एक टापू पर कहां छिपा है .जिसके बाद हर धमाल की तरह इस सीजन भी सारे किरदारों के बीच उस छिपे खजाने को ढूँढने की होड़ मच जाती है.पुराने अतरंगी किरदारों के साथ साथ इस बार इस बार नए किरदार भी जुड़े हैं .किस तरह से ये सारे किरदार खजाने तक पहुंचते हैं और फिर उनकी जान पर बन आती है . जान बचती है लेकिन खज़ाने का इस बार क्या होगा .यही आगे की कहानी है .
फिल्म की क्या है खूबियां और कमी?
फ़िल्म की खूबियां और खामियां धमाल का मतलब एक ऐसी फ़िल्म जिसके लिए आपको अपना दिमाग़ घर पर छोड़कर आना होगा. इस बार भी मामला वही है लेकिन धमाल का मतलब साफ़ सुथरी एडवेंचर कॉमेडी फ़िल्म भी रही है . जिसके कई आइकॉनिक संवाद और दृश्य रहे हैं .पिछली फ़िल्मों की तरह इस बार भी खज़ाना है. साथ में साँप,ऑक्टोपस,मगरमच्छ,शेर के साथ भूत भी है लेकिन इस बार कहानी के साथ साथ कॉमेडी ग़ायब हो गई है . लगभग सवा दो घंटे की इस फ़िल्म में मुश्किल से चार पाँच जगहों पर ही हंसी आती है .कहानी में ना कोई ट्विस्ट है और ना ही ऐसा कोई एडवेंचर जो रोमांच को बढ़ाता है . फ़िल्म के आख़िरी में किरदारों के इमोशन या कहे हृदय परिवर्तन भी थोपा हुआ सा लगता है .कॉमेडी के नाम पर मोटापे और शारीरिक खामियों पर जमकर कॉमेडी की गई है .कुछ चुटकुले भी चिपका दिए गए हैं . जिनका फ़िल्म से कुछ लेना देना नहीं है .मेकर्स ने हंसाने के लिए धमाल के ही नोस्टेलिजिया का इस्तेमाल जमकर किया है . हर पंद्रह मिनट में कोई ना कोई किरदार ये लगता नज़र आ जाता है कि तूने धमाल नहीं देखी तो कोई कहता कि टोटल धमाल नहीं देखी. जो लेखन टीम की खामियों को बखूबी उजागर करता है .
फिल्म का संगीत
फ़िल्म के गीत संगीत की बात करें तो गानों के नाम पर भी कुछ नया मिला है. मराठी सांग गुलाबी साड़ी और भोजपुरी गाना चटनी को थोड़ा तड़का लगाकर हिंदी में परोस दिया गया है .वैसे धमाल सीरीज में हमेशा ही गीत संगीत के नाम पर पुराने गानों को रीमिक्स वर्जन ही सुनने को मिला है . फ़िल्म का वीएफ़एक्स भी कमज़ोर रह गया है.पर्दे पर बहुत कुछ नकली सा लगता है,जबकि इस तरह की एडवेंचर और ट्रेजर हंट फ़िल्मों में सशक्त वीएफएक्स इसकी सबसे बड़ी ज़रूरत होती है .
कमज़ोर लेखन ने किरदारों को भी किया कमज़ोर
अभिनय की बात करे तो अजय देवगन ठीक ठाक रहे हैं . उनके करने को कुछ ख़ास नहीं था .अरशद वारसी, जावेद जाफरी ये कॉमेडी के ऐसे नाम धमाल सीरीज की फ़िल्मों में रहे हैं, जो आपको हंसी से लोटपोट करने के लिए काफी हैं लेकिन कमजोर लेखन इस बार उन्हें बहुत ज़्यादा मौका नहीं दे पायी है .संजय मिश्रा,रितेश देशमुख और अंजलि आनंद ठीक ठाक रहे हैं .रवि किशन को वेस्ट किया गया है तो ईशा गुप्ता को बहुत कम स्क्रीन स्पेस मिला है .बाकी के किरदार ठीक ठाक हैं.
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