Priyanka Singh Exclusive: बिहार के गोपालगंज जिले से निकलकर देश-विदेश में अपनी मखमली आवाज का जादू बिखेरने वाली प्रियंका सिंह आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं. रूढ़िवादी सोच, भोजपुरी इंडस्ट्री की फूहड़ता व सरकारी तंत्र के भेदभाव जैसी कई मुश्किलों को पार कर उन्होंने संगीत की दुनिया में अपना एक बड़ा मुकाम बनाया है. प्रियंका भोजपुरी में इडीएम, हिप-हॉप व ट्रांस जैसा नया फ्यूजन लाने वाली पहली महिला कलाकार हैं. उन्होंने भोजपुरी के पारंपरिक लोकगीतों की आत्मा को बिना चोट पहुंचाए उसे एक नया और आधुनिक रूप दिया है. पेश है संघर्ष, सफलता व भविष्य की योजना पर आधारित प्रियंका सिंह से हुई बातचीत के मुख्य अंश.
Q. गोपालगंज से लेकर देश-विदेश के बड़े मंचों तक पहुंचने के इस सफर में एक महिला कलाकार के तौर पर आपको क्या मुश्किलें आईं?
– मेरा यह सफर बहुत सारे उतार-चढ़ाव और संघर्षों से भरा रहा है. मैं गोपालगंज के एक ऐसे रूढ़िवादी माहौल से आती हूं, जहां उस समय लड़कियों का गाना-बजाना अच्छा नहीं माना जाता था. मेरे पिताजी सरकारी नौकरी में थे, तो लोग अक्सर उनसे आकर कहते थे कि ‘अपनी बेटी को गाना बंद करवाओ, अच्छे घरों में यह सब कौन सुनता है?’ इस वजह से मुझे कई बार बहुत अपमानित होना पड़ा. लेकिन मेरे माता-पिता ने मेरी हिम्मत टूटने नहीं दी, वे मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर चले.
जब मैं बहुत सारे अरमान लेकर मुंबई आई और भोजपुरी इंडस्ट्री में कदम रखा, तो यहां का माहौल देखकर बुरी तरह हताश हो गई. यहां डबल मीनिंग गाने बन रहे थे और लोगों का व्यवहार किसी भी लड़की के लिए आरामदायक नहीं था. मुझे लगा कि मेरे सारे सपने टूट गए. पर मैंने हार नहीं मानी, कुछ अच्छे लोगों से मुलाकात हुई और मैंने भोजपुरी लोकगीतों को नए फ्यूजन स्टाइल में गाकर अपनी एक अलग और साफ-सुथरी पहचान बनाई.
Q. आज के डिजिटल दौर में जब गानों का ट्रेंड बहुत जल्दी बदल जाता है, तब आप अपने गानों में भोजपुरी की मौलिकता कैसे बचाए रखती हैं?
– समय के साथ माध्यम बदलते रहते हैं, पहले टीवी का जमाना था और आज डिजिटल का टाइम है. ट्रेंड्स आते-जाते रहते हैं, लेकिन जो चीजें हमारी जड़ों से जुड़ी होती हैं, वे कभी नहीं बदलतीं. हमारा पारंपरिक लोक संगीत व भजन ऐसी ही चीजें हैं जो हमेशा अमर रहेंगी.
मैंने शुरू से ही इसी फोक को अपने जीवन का हिस्सा बनाया ताकि मैं अपने बिहार की मिट्टी की खुशबू देश-विदेश तक फैला सकूं. मैंने पारंपरिक गानों को छोड़ा नहीं, बल्कि उन्हें आज की युवा पीढ़ी के हिसाब से ‘फ्यूजन, इडीएम और हिप-हॉप’ स्टाइल में गाया. मेरा पहला ही गाना ‘बदरिया कैसे खेले जैबू सावन में कजरिया..’ एक फोक गाना था, जिसे हमने फ्यूजन स्टाइल में पेश किया. इस तरह आधुनिकता के साथ भोजपुरी की मौलिकता भी बची रही.
Q. पारंपरिक लोक-गीतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए क्या कमियां दिखती हैं और क्या सुधार होने चाहिए?
– सच कहूं तो सबसे बुनियादी कमी हमारे बिहार के कला संस्कृति विभाग में ही है. आज तक इस विभाग ने कला और अच्छे कलाकारों को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं. सबसे पहले तो इसी ढर्रे को सुधारने की जरूरत है. हमारे यहां जो सरकारी महोत्सव या कार्यक्रम होते हैं, उनमें जो असली और काबिल कलाकार हैं, उन्हें मंच ही नहीं मिलता.
मंच और मौका सिर्फ उन्हें मिलता है जिनकी ऊंची पहुंच होती है या जिनकी पहचान होती है. अच्छे कलाकारों का पैमाना सोशल मीडिया के व्यूज नहीं, बल्कि उनकी असल गायकी होनी चाहिए. मैं खुद इस भेदभाव की भुक्तभोगी रही हूं, मुझे शुरू से नजरअंदाज किया गया. जब तक पैरवी-पहुंच को छोड़कर सिर्फ योग्यता के दम पर कलाकारों को बड़ा मंच और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक हमारी संस्कृति का सही मायने में विस्तार नहीं हो सकता.
Q. भोजपुरी म्यूजिक इंडस्ट्री को पुरुष प्रधान माना जाता है, क्या अब महिला कलाकारों को अपनी शर्तों पर काम करने की आजादी और सम्मान मिल रहा है?
– आपके इस सवाल का जवाब खुद इसी प्रश्न के अंदर छिपा हुआ है. अगर महिला कलाकारों को सचमुच अपनी शर्तों पर काम करने की आजादी और सम्मान मिल रहा होता, तो आज यह सवाल ही पैदा नहीं होता. आज भी भोजपुरी इंडस्ट्री में महिलाओं को बराबरी का कोई अधिकार नहीं है. यहां पुरुष व महिला कलाकारों के फीस में जमीन-आसमान का अंतर है और सम्मान भी बराबर नहीं मिलता. सब कुछ सिर्फ कहने के लिए बराबर है.
पहले यहां सिर्फ भारी या मोटी आवाजें ही चलती थीं, लेकिन मैंने पिछले 10 साल लगातार मेहनत करके एक स्वीट और सॉफ्ट आवाज को इंडस्ट्री में स्थापित किया. जनता ने मुझे सर-आंखों पर बिठाया और मुझे लगातार 9 सालों तक ‘बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर’ का अवार्ड भी मिला. रास्ते में रुकावटें बहुत आईं, पर कहते हैं ना कि आसमान में भी सुराख हो सकता है, एक पत्थर तो उछालो तबीयत से.
Q. आने वाले दिनों में आपकी क्या मुख्य योजनाएं हैं और बिहार के संगीत व कलाकारों के भविष्य को बदलने के लिए आपने क्या सोचा है?
– मेरी आगे की तीन मुख्य योजनाएं हैं. पहली, मैं भोजपुरी लोक संगीत को दूसरे राज्यों के कलाकारों के साथ मिलकर बड़े लेवल पर कोलाबोरेट करना चाहती हूं ताकि हमारा संगीत पूरे देश में फैले. दूसरी, मैं ऐसे बच्चों के लिए एक म्यूजिक स्कूल खोलना चाहती हूं जिनका कोई सपोर्ट नहीं है, ताकि वे अपनी काबिलियत के दम पर आगे बढ़ सकें.
तीसरी व सबसे बड़ी योजना मैं खुद बिहार के कला संस्कृति विभाग के उस पद पर आना चाहती हूं जहां बैठकर इस पूरे सिस्टम को सुधारा जा सके. आदरणीय शारदा सिन्हा जी के बाद सरकार ने योग्य कलाकारों को वह जगह कभी नहीं दी. इस व्यवस्था को बदलने के लिए अगर मुझे चुनाव भी लड़ना पड़ा, तो मैं जरूर लड़ूंगी और इसके लिए काम कर रही हूं.
Q. बिहार की उन बेटियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी जो समाज के डर से संगीत में नहीं आ पातीं?
– बिहार की अपनी सभी बहनों-बेटियों से मैं यही कहूंगी कि आप सही रास्ते पर चलिए. हो सकता है कि सही रास्ते पर चलने से थोड़ी देरी हो, क्योंकि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं. लेकिन अगर आपमें हिम्मत और चाह है, तो ईश्वर रास्ता दिखाएंगे और आपको नाम, पहचान और सम्मान सब कुछ मिलेगा.
