जिस अस्पताल में मां सफाईकर्मी, बेटी बनेगी डॉक्टर, भावुक कर देगी इस Topper की कहानी

Success Story: रांची स्थित रिम्स डेंटल कॉलेज में आशा देवी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं. वहीं अब उनकी बेटी डॉक्टर बनेगी. बेटी निशा ने NEET UG 2025 में सफलता हासिल कर, इस कॉलेज में दाखिला पाया है. मां बेटी की ये संघर्ष की कहानी आपको भावुक कर देगी.

NEET Success Story: रांची की एक मां-बेटी की कहानी इन दिनों चर्चा में है, जिसने संघर्ष और मेहनत से नई मिसाल कायम की है. मां जिस अस्पताल में एक आम कर्मचारी थीं, वहीं अब उनकी बेटी डॉक्टर बनेगी. रांची स्थित रिम्स डेंटल कॉलेज (RIIMS Dental College) की चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी आशा देवी के लिए वो पल बेहद खुशी के थे, जब उनकी बेटी निशा को यहां दाखिला मिला. आशा अपनी बेटी के साथ सोमवार को डेंटल कॉलेज पहुंची थी. आशा देवी ने आर्थिक तंगी के बाद भी हमेशा बच्चों को पढ़ाने के लिए जद्दोजहद की है.  

Success Story: मां और बेटी की संघर्ष भरी दुनिया 

आशा देवी मूल रूप से झारखंड की हैं. वे रांची (Ranchi News) स्थित बरियातू के भरमटोली में रहती हैं. उनका जीवन संघर्ष और दर्द से भरा रहा है. लेकिन बेटी के डेंटल कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उन्होंने पहली बार जीवन में खुशी के पल देखे. आशा देवी ने बेटी को पढ़ाने के लिए बहुत संघर्ष किया है और उनकी बेटी ने रिजल्ट देकर, मां के संघर्षों को सार्थक कर दिया. 

Success Story: पति को खोने का दु:ख

आशा देवी के स्वर्गीय पति विजय शाह दवा दुकान में काम करते थे और समय मिलने पर टैम्पू चलाते थे. वर्ष 2008 में उनके निधन से पूरा परिवार कमजोर पड़ गया और आशा देवी और बच्चे बेसहारा हो गए. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी.

Success Story: निशा की बड़ी बहन और भाई भी अपने अपने करियर में हैं सफल 

निशा तीन भाई बहन हैं, भाई सूरज और बहन नेहा, दोनों ही उनसे बड़े हैं. बड़ी बहन नेहा ने 10वीं में 90 प्रतिशत अंक हासिल किया था. इसके बाद रांची कॉलेज (Ranchi College) से बीए किया और टाटा मोटर में नौकरी की. वहीं उनके भाई सूरज ने 96% के साथ 10वीं की थी. वो अभी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं. निशा ने नीट यूजी (NEET UG 2025) परीक्षा में सीएमएल रैंक 556 और कैटेगरी (BC II) रैंक 105 हासिल कर रिम्स डेंटल कॉलेज में दाखिला लिया. अब वह डॉक्टर बनेंगी. 

Success Story: बच्चों की पढ़ाई से नहीं किया समझौता

आशा देवी ने तीनों बच्चों का पालन पोषण अकेले ही किया. उन्होंने कहा कि उस वक्त लगा कि सब खत्म हो गया. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और घर चलाने के साथ-साथ बच्चों को पढ़ाती भी रहीं. शुरुआत में वे लोगों के घरों में काम करती थीं. एक डॉक्टर के यहां काम करते हुए उन्हें वर्ष 2011 में चतुर्थश्रेणी की नौकरी मिली. आशा देवी ने भले ही कम खाना खाकर गुजारा किया हो लेकिन बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं रहने दी. 

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