UPSC CSE Mains के GS-1 पेपर में इतिहास को लेकर पिछले एक दशक का ट्रेंड एक दिलचस्प बदलाव दिखाता है.
अगर 2016 से 2025 को संदर्भ अवधि मानें, तो इतिहास से पूछे जाने वाले सवालों की कुल संख्या में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया है.
2018 के बाद इतिहास से सामान्यतः 6–7 प्रश्नों का स्पेस बना हुआ है. लेकिन इन सवालों के भीतर प्राचीन, मध्यकालीन, आधुनिक भारत, कला-संस्कृति और विश्व इतिहास के बीच संतुलन लगातार बदल रहा है.
शुभांगी शर्मा, UPSC Educator, के अनुसार इस बदलाव को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि अब UPSC इतिहास में केवल जानकारी की परीक्षा नहीं ले रहा, बल्कि उम्मीदवार की ऐतिहासिक समझ, विश्लेषण और उत्तर प्रस्तुत करने की क्षमता को भी परख रहा है.
1. इतिहास के सवालों का ‘आंतरिक संतुलन’ बदल रहा है
2016–2025 की अवधि को देखें तो आधुनिक भारत को इतिहास के सवालों में सबसे बड़ा और स्थायी हिस्सा मिलने की धारणा अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं रही. 2018 के बाद इतिहास से लगभग 6–7 प्रश्नों का स्तर बना रहने के बावजूद इनके विषय बदलते रहे हैं.
प्राचीन इतिहास, मध्यकालीन इतिहास तथा Art & Culture ने कई वर्षों में अपनी उपस्थिति मजबूत की है. दूसरी ओर, Post-Independence India से सवाल नियमित नहीं रहे हैं. विश्व इतिहास की बात करें तो इसकी मौजूदगी हाल के वर्षों में विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है और लगातार तीन वर्षों तक इससे प्रश्न देखने को मिले.
इसका सीधा मतलब है कि अभ्यर्थी इतिहास को केवल Modern India-केंद्रित तैयारी तक सीमित नहीं रख सकता. पूरे GS-1 syllabus के बीच संतुलित तैयारी जरूरी है.
2. UPSC अब पूछ रहा है- ‘आप जानते क्या हैं?’ से ज्यादा ‘समझते क्या हैं?’
इतिहास के प्रश्नों में सबसे बड़ा बदलाव उनकी प्रकृति में आया है. UPSC अब केवल तथ्य, तिथि, व्यक्ति या स्थापत्य की विशेषताएं बताने वाले प्रश्नों तक सीमित नहीं है.
उदाहरण के लिए, मंदिर स्थापत्य या मूर्तिकला पर सवाल केवल उसकी विशेषताओं की सूची मांगने के बजाय यह पूछ सकता है कि उस कला से तत्कालीन समाज के बारे में क्या पता चलता है.
यानी प्रश्न का फोकस fact recall से historical interpretation की ओर बढ़ रहा है.
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज किसी भी विषय की बुनियादी जानकारी कई किताबों, नोट्स, टेस्ट सीरीज और ऑनलाइन संसाधनों में आसानी से उपलब्ध है. इसलिए केवल अधिक तथ्य याद कर लेना अब अपने-आप में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त नहीं देता.
अंतर पैदा होता है इस बात से कि उम्मीदवार किसी तथ्य को कितनी अच्छी तरह समझता है, दूसरे विषयों से जोड़ता है और सीमित शब्दों में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है.
3. Answer Writing को आखिरी चरण नहीं, रोज की आदत बनाएं
ऐसे बदलते ट्रेंड में उम्मीदवारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीति नियमित answer writing है. उत्तर लेखन को परीक्षा से कुछ महीने पहले शुरू करने के बजाय तैयारी के शुरुआती चरण से ही आदत का हिस्सा बनाना चाहिए.
शुभांगी शर्मा की सलाह है कि केवल उत्तर लिखना पर्याप्त नहीं है. प्रक्रिया होनी चाहिए- लिखिए, समीक्षा कीजिए, अपनी कमजोरी पहचानिए और उसी उत्तर को दोबारा बेहतर तरीके से लिखिए.
इससे धीरे-धीरे उत्तर में structure, argument, examples, linkage और conclusion बेहतर होते हैं. बाजार में उपलब्ध मॉडल आंसर को हूबहू कॉपी करने के बजाय उम्मीदवार को self-analysis की आदत विकसित करनी चाहिए.
इसी तरह, किताबों की संख्या बढ़ाते जाना भी तैयारी का पर्याय नहीं है. कुछ भरोसेमंद पुस्तकों को बार-बार और गहराई से पढ़ना, दर्जनों स्रोतों को सतही तौर पर पढ़ने से अधिक उपयोगी है.
UPSC इतिहास की तैयारी का नया मंत्र इसलिए तीन शब्दों में समझा जा सकता है- ‘कम पढ़ें, गहराई से समझें, लगातार लिखें.’
इतिहास में सफलता अब केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उम्मीदवार को कितने तथ्य याद हैं; असली बढ़त इस बात से बनती है कि वह उन तथ्यों को कितनी अच्छी तरह विश्लेषण, संदर्भ और उत्तर में बदल पाता है.
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