गालूडीह.
घाटशिला वन क्षेत्र के अधीन आने वाले बड़ाकुर्शी, छोटाकुर्शी, गिधिबिल और आमचुड़िया के करीब 50 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला काजू का समृद्ध जंगल इन दिनों अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. मई-जून का महीना आते ही जंगलों में काजू के फल पककर तैयार हो गए हैं, लेकिन पिछले कई वर्षों से इन मूल्यवान वनों की सुरक्षा करने में वन विभाग पूरी तरह विफल साबित हो रहा है.आग की भेंट चढ़ रहे पेड़, उत्पादन में भारी गिरावट
मार्च-अप्रैल से शुरू होने वाले काजू के सीजन में इस बार उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गयी है. इसका मुख्य कारण गर्मियों के मौसम में काजू के जंगलों में लगातार लगने वाली आग है. आग की लपटों में झुलस जाने के कारण काजू के पुराने और फलदार पेड़ धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं. वन विभाग की ओर से इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाने के कारण वनों का दायरा सिकुड़ता जा रहा है.निष्क्रिय हुईं वन सुरक्षा समितियां, बिचौलियों का बढ़ा प्रभाव
काजू इस क्षेत्र का एक मुख्य वनोत्पाद है, जो स्थानीय ग्रामीणों के लिए रोजगार का बड़ा जरिया है. कई वर्ष पहले वन विभाग ने काजू वनों की सुरक्षा के लिए ””वन सुरक्षा समिति”” का गठन कर इसका मालिकाना हक ग्रामीणों को सौंपा था. ग्रामीण समिति गठित कर खुद जंगल की रखवाली करते थे और फलों को बेचकर होने वाली आमदनी को समिति के बैंक खाते में जमा कर गांव के विकास में खर्च किया जाता था. अब यह व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है. रखवाली के अभाव में ग्रामीण व्यक्तिगत रूप से जंगलों से काजू तोड़ते हैं और औने-पौने दामों में स्थानीय व्यापारियों को बेच देते हैं, जिससे सामूहिक विकास की योजनाएं ठप पड़ गयी हैं.
