चीनी मिलों के सामने नई मुसीबत, बढ़ता स्टॉक और कम खपत ने बढ़ाई सिरदर्द

Sugar Production 2025-26: भारत में चीनी प्रोडक्शन 8% बढ़कर 274.8 लाख टन तक पहुंच गया है. महाराष्ट्र और कर्नाटक में प्रोडक्शन बढ़ा है, लेकिन यूपी में पिछले साल के मुकाबले गिरावट दर्ज हुई है.

Sugar Production 2025-26: देश में चल रहे शुगर सीजन (SS 2025-26) में चीनी का प्रोडक्शन पिछले साल के मुकाबले बेहतर स्थिति में नजर आ रहा है. ‘इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन’ (ISMA) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, 15 अप्रैल 2026 तक भारत का चीनी प्रोडक्शन 274.8 लाख टन तक पहुंच गया है. पिछले साल इसी समय तक यह आंकड़ा 254.96 लाख टन था, जो इस बार करीब 8% की बढ़त दर्शाता है. 

हालांकि, प्रोडक्शन बढ़ने के बावजूद अब पेराई का सीजन खत्म होने की कगार पर है. वर्तमान में देशभर में सिर्फ 19 मिलें ही चालू हैं, जबकि पिछले साल इस वक्त 38 मिलें काम कर रही थीं. 

किन राज्यों ने मारी बाजी और कौन रहा पीछे?

ANI की रिपोर्ट के अनुसार, चीनी प्रोडक्शन के मामले में इस साल राज्यों की स्थिति में बड़ा बदलाव आया है. उत्तर प्रदेश, जो चीनी का गढ़ माना जाता है, वहां प्रोडक्शन पिछले साल के 91.10 लाख टन के मुकाबले थोड़ा गिरकर 89.26 लाख टन रहा है. यूपी में अब सिर्फ 6 मिलें ही चल रही हैं. 

दूसरी तरफ, महाराष्ट्र और कर्नाटक में प्रोडक्शन में जबरदस्त सुधार हुआ है. महाराष्ट्र ने 99.3 लाख टन चीनी पैदा की है, जो पिछले साल के 80.88 लाख टन से काफी ज्यादा है.  वहीं कर्नाटक ने भी 48.10 लाख टन का आंकड़ा छुआ है. हालांकि इन दोनों राज्यों में मुख्य सीजन की मिलें अब बंद हो चुकी हैं, लेकिन कर्नाटक और तमिलनाडु में कुछ मिलें जून-जुलाई के विशेष सीजन में दोबारा चालू हो सकती हैं. 

क्यों हो रही है MSP बढ़ाने की मांग?

प्रोडक्शन तो बढ़ गया है, लेकिन चीनी मिलें आर्थिक दबाव में हैं. मिल मालिकों का कहना है कि चीनी बनाने की लागत बढ़ गई है, जबकि बाजार में चीनी की कीमत (Ex-mill price) उस अनुपात में नहीं बढ़ी. इसी वजह से ISMA ने सरकार से न्यूनतम बिक्री मूल्य (MSP) में जल्द सुधार करने की मांग की है. मिलों का तर्क है कि अगर MSP नहीं बढ़ाया गया, तो उनके पास कैश की कमी हो जाएगी, जिससे किसानों के गन्ने का भुगतान (Cane arrears) समय पर करना मुश्किल हो जाएगा. 

क्या हैं मिलों के सामने बड़ी चुनौतियां?

चीनी मिलों के सामने सिर्फ आर्थिक ही नहीं, बल्कि तकनीकी चुनौतियां भी हैं. एथेनॉल की खरीद कीमतों में बदलाव न होने और कम आवंटन के कारण डिस्टिलरी क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. साथ ही, देश में LPG सप्लाई में आ रही दिक्कतों की वजह से फूड आउटलेट्स का कामकाज प्रभावित हुआ है, जिसका सीधा असर चीनी की खपत पर पड़ा है. 

अंत में, ISMA का मानना है कि अगर सरकार समय पर सही नीतियां लागू करती है, तो इससे न केवल मिलों की वित्तीय सेहत सुधरेगी, बल्कि किसानों के हितों की रक्षा भी होगी और भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी. 

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लेखक के बारे में

By Soumya Shahdeo

सौम्या शाहदेव ने बैचलर ऑफ़ आर्ट्स इन इंग्लिश लिटरेचर में ग्रेजुएशन किया है और वह इस समय प्रभात खबर डिजिटल के बिजनेस सेक्शन में कॉन्टेंट राइटर के रूप में काम कर रही हैं. वह ज़्यादातर पर्सनल फाइनेंस से जुड़ी खबरें लिखती हैं, जैसे बचत, निवेश, बैंकिंग, लोन और आम लोगों से जुड़े पैसे के फैसलों के बारे में. इसके अलावा, वह बुक रिव्यू भी करती हैं और नई किताबों व लेखकों को पढ़ना-समझना पसंद करती हैं. खाली समय में उन्हें नोवेल्स पढ़ना और ऐसी कहानियाँ पसंद हैं जो लोगों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं.

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