Indian Ocean : पिछले दिनों भारत ने समुद्री क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम उठाया. देश की प्रमुख रक्षा शिपबिल्डिंग कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) ने श्रीलंका के सबसे बड़े शिपयार्ड कोलंबो डॉकयार्ड पीएलसी में 51 फीसदी हिस्सेदारी हासिल कर ली है. भारत ने पहली बार किसी विदेशी शिपयार्ड का अधिग्रहण किया है. रक्षा मंत्रालय के अधीन देश की प्रमुख डिफेंस शिपबिल्डिंग कंपनी एमडीएल ने श्रीलंका में परिचालन नियंत्रण हासिल कर लिया है और कोलंबो डॉकयार्ड अब उसकी सहायक कंपनी बन गया है.
यह सुविधा कोलंबो बंदरगाह के अंदर स्थित है, जहां चार ग्रेविंग डॉक हैं-सबसे बड़ा 1,25,000 डेडवेट टन (डीडब्ल्यूटी) क्षमता वाला. विस्तृत रिपेयर बर्थ सुविधाएं भी वहां उपलब्ध हैं. वर्ष 1974 से संचालित यह शिपयार्ड जहाज निर्माण, मरम्मत, भारी इंजीनियरिंग व ऑफशोर कार्यों में श्रीलंका का अग्रणी केंद्र है. यह कदम भारत की समुद्री नीति के लिए मील का पत्थर और देश की समुद्री महत्वाकांक्षा का प्रतीक है. यह सिर्फ एक कंपनी का वाणिज्यिक सौदा नहीं है, ‘सागर’ (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) नीति का व्यावहारिक रूप है. यह कदम आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत, 2047 के सपने को समुद्री क्षेत्र में ले जाता है.
अभी तक भारत जहाज निर्माण में आयात पर निर्भर था, पर अब विदेशी शिपयार्ड के जरिये उसके लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, संयुक्त उत्पादन और प्रशिक्षण का द्वार खुल गया है. यह कदम आर्थिक लाभ के साथ-साथ श्रीलंका के साथ रिश्तों में कूटनीतिक भरोसा बढ़ाने वाला भी है. श्रीलंका को जहां एक वैकल्पिक साझेदार मिल रहा है, वहीं भारत अपनी समुद्री उपस्थिति बढ़ा रहा है. यह भारत की सक्रिय समुद्री कूटनीति का उदाहरण है, जो ‘नेबरहुड फर्स्ट’ की नीति को मजबूत बनाता है. कोलंबो डॉकयार्ड पर नियंत्रण हासिल करने को हंबनटोटा का रणनीतिक जवाब माना जा सकता है, लेकिन इसे पूर्ण रूप से उसका जवाब कहना ठीक नहीं. वर्ष 2017 में कर्ज चुका पाने की असमर्थता के कारण श्रीलंका ने हंबनटोटा बंदरगाह का पट्टा 99 साल के लिए चीन को दे दिया था, और चीन की मर्चेंट्स पोर्ट होल्डिंग्स ने उसे ‘डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी’ का प्रतीक बना दिया. हंबनटोटा अब चीनी नौसैनिक जहाजों के लिए रसद और संभावित निगरानी केंद्र बन सकता है, जो भारत के लिए सुरक्षा चिंता का विषय है. जबकि कोलंबो डॉकयार्ड का भारत द्वारा अधिग्रहण रिश्तों में संतुलन बहाली का कदम है.
हिंद महासागर के मुख्य समुद्री मार्ग पर स्थित कोलंबो बंदरगाह दक्षिण एशिया का सबसे व्यस्त हब है. भारत इस पर जहाज मरम्मत और निर्माण की क्षमता हासिल कर रहा है. हमारा यह कदम चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति को चुनौती देता है, लेकिन सकारात्मक तरीके से. ऋण जाल में फंसाने के बजाय श्रीलंका के साथ भारत का रिश्ता सहयोग और निवेश के आधार पर है. श्रीलंका भी इस सौदे से लाभान्वित होगा, क्योंकि जापान के ओनोमिची डॉकयार्ड से शेयर खरीदकर भारत ने पारदर्शी प्रक्रिया अपनायी है. भारत का यह कदम ‘आक्रामक’ नहीं, संतुलित और सहयोगी है. क्षेत्रीय, आर्थिक और रक्षा दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है. इससे भारत की समुद्री क्षमता में गुणात्मक वृद्धि होगी. कोलंबो डॉकयार्ड की क्षमता भारत को बड़े जहाजों की मरम्मत और निर्माण का क्षेत्रीय केंद्र बनायेगी. मेरीटाइम अमृत काल विजन, 2047 के तहत भारत 2030 तक दुनिया के शीर्ष 10 और 2047 तक शीर्ष पांच शिपबिल्डिंग देशों में शामिल होना चाहता है.
यह सौदा उस लक्ष्य की दिशा में उठाया गया ठोस कदम है. आर्थिक रूप से यह कदम रोजगार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और निर्यात बढ़ायेगा. रक्षा दृष्टि से एमडीएल अब विदेशी युद्धपोतों, पनडुब्बियों और सहायक जहाजों की मरम्मत कर सकेगा. भू-राजनीतिक दृष्टि से यह हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की विश्वसनीयता बढ़ायेगा. यही नहीं, श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश के साथ गहरा संबंध चीन की बढ़ती उपस्थिति को संतुलित भी करेगा. कुल मिलाकर, यह रणनीतिक स्वतंत्रता और क्षेत्रीय नेतृत्व की दिशा में बड़ा कदम है. भारत को यह कदम उठाने की जरूरत रक्षा, अर्थव्यवस्था और कूटनीति के त्रिकोण से पड़ी. सबसे बड़ा कारण तो चीन की बढ़ती समुद्री उपस्थिति ही है. ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के तहत चीन ने हंबनटोटा, कोलंबो पोर्ट सिटी और अन्य परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश किया है. श्रीलंका का कर्ज संकट चीन को रणनीतिक लाभ दे रहा है, जबकि भारत को अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और व्यापार मार्गों की (देश का 95 फीसदी व्यापार समुद्र से होता है) रक्षा करनी है.
दूसरा कारण है आत्मनिर्भरता. भारत अब भी बड़े जहाजों के निर्माण और मरम्मत में विदेशी मदद पर निर्भर है. लेकिन कोलंबो डॉकयार्ड जैसे केंद्र से प्रौद्योगिकी, कुशल श्रम और बुनियादी ढांचा हासिल होगा. और यह कदम उठाने का तीसरा महत्वपूर्ण कारण क्षेत्रीय सुरक्षा है. हिंद महासागर में सागर नीति के तहत भारत ‘सभी के लिए सुरक्षा और विकास’ चाहता है. श्रीलंका के साथ मजबूत संबंध, जाहिर है, पाकिस्तान-चीन गठजोड़ को संतुलित करेगा. चौथा कारण है आर्थिक अवसर. महामारी, वैश्विक आपूर्ति शृंखला संकट और ऊर्जा सुरक्षा ने समुद्री क्षेत्र को प्राथमिकता दी है. यह कदम इन चुनौतियों का समाधान है.
कोलंबो डॉकयार्ड अब भारतीय नौसेना के जहाजों के लिए फॉरवर्ड बेस की तरह काम करेगा. युद्धपोतों, फ्रिगेट्स और पनडुब्बियों की मरम्मत कोलंबो में तेजी से हो सकेगी, जिससे भारतीय मुख्य भूमि से दूरी कम होगी. इससे लॉजिस्टिक्स, समय और लागत की बचत होगी. रणनीतिक रूप से यह कदम क्षेत्रीय निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ायेगा. इससे न केवल नौसेना की ताकत बढ़ेगी, बल्कि हिंद महासागर ‘भारतीय महासागर’ बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा. भारतीय नौसेना अब श्रीलंकाई नौसेना के साथ संयुक्त अभ्यास, प्रशिक्षण और रखरखाव में गहरा सहयोग कर सकेगी. हिंद महासागर में चीन के बढ़ते जहाजों के सामने भारत की उपस्थिति मजबूत होगी. अनुमान है कि इससे, खासकर अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में, नौसेना की परिचालन दक्षता 20-30 फीसदी तक बढ़ सकती है. एमडीएल कोलंबो में नये युद्धपोत डिजाइन और निर्माण कर सकेगा, जिससे भारतीय नौसेना को आधुनिक प्लेटफॉर्म मिलेंगे. इससे हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की ‘ब्लू वॉटर’ क्षमता मजबूत होगी और क्षेत्रीय स्थिरता में भारत की भूमिका बढ़ेगी. यह कदम साबित करता है कि भारत न केवल एक क्षेत्रीय शक्ति है, बल्कि वैश्विक समुद्री खिलाड़ी भी बन रहा है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
