H-1B Visa: अमेरिका में काम करने का सपना देख रहे कुशल पेशेवरों के लिए साल 2026 एक बड़ा बदलाव लेकर आया है. जहां पिछले कई सालों से H-1B वीजा की लॉटरी निकलना ‘असंभव’ सा होता जा रहा था, वहीं इस साल चयन दर (Selection Rate) ने पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. कुछ मामलों में तो सफलता की दर 75% तक पहुंच गई है.
इतनी बड़ी बढ़त कैसे हुई?
हैरानी की बात यह है कि वीजा की संख्या (85,000) नहीं बढ़ी है, बल्कि आवेदकों की भीड़ कम हो गई है. इसके पीछे ट्रंप प्रशासन की कुछ सख्त नीतियां हैं:
- $100,000 की भारी फीस: व्हाइट हाउस ने अमेरिका के बाहर से बुलाए जाने वाले हर नए H-1B कर्मचारी पर $100,000 (करीब ₹83 लाख) की फीस लगा दी है.
- एप्लीकेशन पूल में गिरावट: इतनी भारी फीस के कारण यूनिवर्सिटी, अस्पताल और कई टेक कंपनियों ने विदेश से नए लोग बुलाना कम कर दिया है. इस साल आवेदनों की संख्या पिछले साल के मुकाबले 43% तक गिर गई है.
- नया वेटेज सिस्टम: पुरानी ‘रैंडम’ लॉटरी की जगह अब एक नया सिस्टम लागू किया गया है, जो ज्यादा सैलरी और अनुभवी (Senior) कर्मचारियों को प्राथमिकता देता है.
पहले और अब
- पहले: चयन की संभावना 3 में से 1 (करीब 33%) रहती थी.
- अब: बड़ी लॉ फर्म्स जैसे BAL और Ogletree Deakins ने 50% से 71% तक की सफलता दर दर्ज की है.
- खास वर्ग: मास्टर डिग्री और अधिक सैलरी वाले आवेदकों के लिए यह दर 75% के पार पहुंच गई है.
किसे हुआ सबसे ज्यादा फायदा?
इस नई नीति का सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को हुआ है जो पहले से ही अमेरिका में मौजूद हैं (जैसे छात्र या अन्य वीजा धारक). उनके नियोक्ताओं को $100,000 की एक्स्ट्रा फीस नहीं देनी पड़ती, जिससे उनके चयन की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं.
टेक सेक्टर और AI का असर
रिपोर्ट्स के मुताबिक, टेक कंपनियों ने भी इस साल कम आवेदन किए हैं. इसकी दो मुख्य वजहें हैं:
- AI में निवेश: कंपनियां अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर ज्यादा खर्च कर रही हैं और कम अनुभवी ‘फ्रेशर्स’ के बजाय गिने-चुने ‘सीनियर’ टैलेंट को ही मौका दे रही हैं.
- कानूनी पेच: $100,000 की फीस को कई अदालतों में चुनौती दी गई है. कई कंपनियां “रुको और देखो” (Wait and See) की नीति अपना रही हैं.
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