8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग से यूपी, एमपी, छत्तीसगढ़ और झारखंड के कर्मचारियों को कितना होगा फायदा?

8th Pay Commission: वेतन बढ़ोतरी की गणना का सबसे अहम आधार फिटमेंट फैक्टर होता है. यही फैक्टर तय करता है कि किसी कर्मचारी की मौजूदा बेसिक सैलरी कितनी गुना बढ़ेगी. सरल शब्दों में कहें तो पुरानी बेसिक सैलरी को फिटमेंट फैक्टर से गुणा करके नई सैलरी तय की जाती है.

By Abhishek Pandey | January 7, 2026 2:42 PM

8th Pay Commission: केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनर्स को 8वें केंद्रीय वेतन आयोग से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद के बीच अब राज्य सरकार के कर्मचारियों की नजरें भी वेतन संशोधन पर टिकी हैं. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राज्यों के कर्मचारी भी केंद्र के समान वेतन और पेंशन बढ़ोतरी का लाभ पाएंगे और उन्हें एरियर कब तक मिलेगा?

8वें वेतन आयोग की समयसीमा क्या कहती है?

केंद्र सरकार की ओर से पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि वेतन आयोग की सिफारिशें आमतौर पर हर 10 साल में लागू की जाती हैं. इसी परंपरा को देखते हुए सरकार ने संकेत दिया है कि 8वें केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से प्रभावी हो सकती हैं. सरकारी बयान के अनुसार, यही वह तारीख होगी जिससे वेतन और पेंशन में संशोधन की गणना की जाएगी, भले ही इसे औपचारिक रूप से बाद में लागू किया जाए.

राज्य कर्मचारियों को वेतन बढ़ोतरी कब मिलेगी?

राज्य सरकारों के लिए केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं होता. इस विषय पर नेक्सडिग्म (Nexdigm) के डायरेक्टर पेरोल सर्विसेज, रामचंद्रन कृष्णमूर्ति का कहना है कि: “कुछ राज्य केंद्र की सिफारिशों को 6 महीने से 1 साल के भीतर लागू कर देते हैं, जबकि कई राज्यों में यह प्रक्रिया 1 से 3 साल तक खिंच जाती है. इसकी वजह यह है कि अधिकांश राज्य अपने अलग वेतन आयोग बनाकर वित्तीय असर का आकलन करते हैं.” यानी राज्य कर्मचारियों को वेतन बढ़ोतरी के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ सकता है.

उत्तर प्रदेश के कर्मचारियों के लिए क्या संकेत?

उत्तर प्रदेश में 7वें वेतन आयोग की अवधि 31 दिसंबर 2025 को समाप्त हो रही है, जो केंद्रीय वेतन आयोग की अवधि के समान है. ऐसे में संभावना है कि 1 जनवरी 2026 से राज्य कर्मचारियों को एरियर का हक मिल सकता है, बशर्ते राज्य सरकार नई सिफारिशें लागू करे. महत्वपूर्ण बात यह है कि वेतन या पेंशन लागू होने में जितनी देरी होती है, उतने पूरे समय का एरियर कर्मचारियों और पेंशनर्स को दिया जाता है.

क्या सभी राज्य केंद्र जैसा वेतन बढ़ाएंगे?

इस सवाल का सीधा जवाब नहीं है. सभी राज्य सरकारें केंद्र सरकार के वेतन आयोग की सिफारिशों को ज्यों-का-त्यों लागू नहीं करतीं. हर राज्य अपनी आर्थिक स्थिति, राजकोषीय घाटे, आय के स्रोत और वित्तीय प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए वेतन और पेंशन में संशोधन का फैसला करता है. इसी वजह से अलग-अलग राज्यों में वेतन आयोगों की संख्या और शर्तें भी अलग हैं. उदाहरण के तौर पर केरल में 11वां राज्य वेतन आयोग गठित किया जा चुका है, जबकि कर्नाटक अभी 7वें वेतन आयोग के दायरे में है. इससे साफ होता है कि राज्यों की वेतन नीति केंद्र से पूरी तरह मेल खाना जरूरी नहीं है.

फिटमेंट फैक्टर क्या होता है और क्यों है अहम?

वेतन बढ़ोतरी की गणना का सबसे अहम आधार फिटमेंट फैक्टर होता है. यही फैक्टर तय करता है कि किसी कर्मचारी की मौजूदा बेसिक सैलरी कितनी गुना बढ़ेगी. सरल शब्दों में कहें तो पुरानी बेसिक सैलरी को फिटमेंट फैक्टर से गुणा करके नई सैलरी तय की जाती है. इसलिए यह फैक्टर जितना ज्यादा होगा, वेतन में बढ़ोतरी उतनी ही अधिक मानी जाती है.

7वें केंद्रीय वेतन आयोग में 2.57 का फिटमेंट फैक्टर तय किया गया था. इसका मतलब यह हुआ कि 6वें वेतन आयोग के तहत मिलने वाली बेसिक सैलरी में करीब 157 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई. हालांकि, उसी समय महंगाई भत्ता (DA) को शून्य कर दिया गया, जिसके कारण कर्मचारियों को वास्तविक रूप से महसूस हुई बढ़ोतरी उम्मीद से कम लगी.

राज्यों में अलग-अलग फार्मूला

राज्य सरकारों ने भी अपने-अपने हिसाब से फिटमेंट फैक्टर अपनाया. उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश ने केंद्र की तरह ही 2.57 फिटमेंट फैक्टर लागू किया, जबकि पंजाब ने इससे थोड़ा ज्यादा 2.59 का गुणांक तय किया. इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्यों में वेतन संशोधन का फार्मूला अलग-अलग हो सकता है और राज्य कर्मचारियों को मिलने वाली बढ़ोतरी केंद्र सरकार के कर्मचारियों से ज्यादा या कम दोनों हो सकती है.

8वें वेतन आयोग से क्या उम्मीद करें?

वेतन विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा महंगाई दर और जीवनयापन की बढ़ती लागत को देखते हुए 8वें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर 2.6 से 3.0 के बीच रहने की संभावना जताई जा रही है. हालांकि, इस पर अंतिम फैसला सरकार ही लेगी. अगर इतना ऊंचा फिटमेंट फैक्टर तय होता है, तो इससे कर्मचारियों की बेसिक सैलरी में बड़ा उछाल, पेंशनर्स को ज्यादा पेंशन और एरियर, और साथ ही राज्य सरकारों पर भारी वित्तीय दबाव देखने को मिल सकता है.

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