झारखंड में पर्यावरण संरक्षण की पहल करते बच्चे

World Environment Day : जलवायु परिवर्तन बचपन को नया रूप दे रहा है. आज अत्यधिक गर्मी, पानी की कमी और पर्यावरणीय दबाव के कारण अनेक बच्चे प्रभावित हो रहे हैं. वे ऐसे जलवायु संकट के बीच बड़े हो रहे हैं, जिसे पैदा करने में उनकी कोई भूमिका नहीं रही है.

-डॉ कनीनिका मित्रा,आस्था अलंग,लक्ष्मी सक्सेना-
(तीनों लेखिका यूनिसेफ झारखंड से जुड़ी हैं)

World Environment Day : जलवायु परिवर्तन सभी को प्रभावित करता है. पर बच्चे इस समस्या की सर्वाधिक कीमत चुका रहे हैं. प्रश्न यह है कि क्या हम उन बच्चों की आवाजों को सुन रहे हैं, जो इससे सर्वाधिक प्रभावित हो रहे हैं? हाल ही में एक फील्ड विजिट के दौरान, गर्मियों की एक दोपहर में, गाड़ी से उतरकर पेड़ की छांव में खड़ी हुई. पास ही कुछ महिलाएं लगभग सूख चुके हैंडपंप से अपने परिवारों के लिए पानी निकालने की कोशिश कर रही थीं. उनमें से एक ने मुझे पानी की पेशकश की और सहजता से कहा, ‘झारखंड में पहले कभी इतनी गर्मी नहीं होती थी.’ उस महिला के ठीक पीछे आदिवासी कला से सजा एक घर था. घर की सीढ़ियों पर बैठे बच्चे उस खाली आंगन को देख रहे थे, जहां वे कभी बेफिक्र होकर खेला करते थे. बढ़ती गर्मी ने उनकी दिनचर्या को भी प्रभावित किया है. स्कूल तक पैदल जाना उनके लिए कठिन हो गया है और तपती कक्षाओं में पढ़ाई करना उनकी रोजमर्रा की चुनौती बन गयी है.


जलवायु परिवर्तन बचपन को नया रूप दे रहा है. आज अत्यधिक गर्मी, पानी की कमी और पर्यावरणीय दबाव के कारण अनेक बच्चे प्रभावित हो रहे हैं. वे ऐसे जलवायु संकट के बीच बड़े हो रहे हैं, जिसे पैदा करने में उनकी कोई भूमिका नहीं रही है. हर वर्ष पांच जून को दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस मनाती है. यह पृथ्वी के साथ हमारे रिश्ते और भविष्य को प्रभावित करने वाले हमारे फैसलों पर विचार करने का अवसर होता है. इस वर्ष जब संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनइपी) द्वारा ‘नाउ फॉर क्लाइमेट’ अभियान चलाया जा रहा है, तब यह आत्ममंथन और भी जरूरी हो गया है. सूखते जलस्रोत, बढ़ता तापमान और प्रभावित होता बचपन- संकट के संकेत अब साफ दिखाई दे रहे हैं. बच्चे सबसे पहले इसकी मार झेल रहे हैं, पर प्रश्न यह है कि क्या बड़े लोग इस पर ध्यान दे रहे हैं?

भारत उन देशों में शामिल है जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील है. वहीं देश की लगभग एक-तिहाई आबादी 14 वर्ष से कम उम्र की है. बच्चे जलवायु और पर्यावरणीय संकटों के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं, विशेषकर वे जो ग्रामीण और निम्न आय वाले समुदायों में रहते हैं. अनुमान है कि उन्हें अत्यधिक गर्मी का सामना आठ गुना अधिक करना पड़ सकता है. साथ ही बाढ़, जंगल की आग और चक्रवात जैसे खतरों का जोखिम भी बढ़ रहा है. इन जलवायुजनित चुनौतियों का असर बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छ पेयजल तक पहुंच पर पड़ता है. यह आपात स्थिति का संकेत है.पर खुशी की बात यह है कि इस संकट के समाधान के लिए बच्चे बड़ों के कदम उठाने का इंतजार नहीं कर रहे हैं. वे अपने स्कूलों, घरों और समुदायों में छोटे, परंतु सार्थक कदम उठा रहे हैं.

सच पूछिए, तो झारखंड में बच्चे मिसाल कायम कर रहे हैं. आज झारखंड के लगभग 41,000 स्कूलों में सक्रिय इको क्लब कार्यरत हैं और स्कूलों के माध्यम से 18 लाख से अधिक पौधे लगाये जा चुके हैं. संदेश स्पष्ट है-बच्चे बदलाव का इंतजार नहीं कर रहे, वे स्वयं बदलाव की अगुवाई कर रहे हैं. पर यह भी सच है कि बच्चों का नेतृत्व अपने आप विकसित नहीं होता. यह तब फलता-फूलता है जब स्कूल, समुदाय और संस्थाएं उन्हें भागीदारी और नेतृत्व के अवसर प्रदान करते हैं. उनके प्रयास महत्वपूर्ण हैं, लेकिन प्रभावी जलवायु कार्रवाई के लिए सरकारों, संस्थाओं और समुदायों के नेतृत्व और निवेश की आवश्यकता है.

झारखंड सरकार ने शिक्षा प्रणाली में जलवायु अनुकूलन को शामिल कर अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है. स्कूली कार्यक्रमों में जलवायु से जुड़े संकेतकों को जोड़ा गया है. राज्यभर के हजारों इको क्लबों के माध्यम से स्कूल ऐसे स्थान बन रहे हैं, जहां पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया जा रहा है और बच्चों को परिवर्तनकारी नेतृत्व के लिए सशक्त बनाया जा रहा है. ये प्रयास इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि युवा परिवर्तन की प्रेरणा बन सकते हैं, पर बेहतर पर्यावरण को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक नीतियां, प्रणालियां और संसाधन उपलब्ध कराना बड़ों और संस्थाओं की जिम्मेदारी है. झारखंड में यूनिसेफ सरकार, स्कूलों और समुदायों के साथ मिलकर बाल नेतृत्व वाली पहलों को प्रोत्साहन दे रहा है. यूनिसेफ विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के साथ भी काम करता है.


जलवायु परिवर्तन की चुनौती जितनी व्यापक है, उसका समाधान भी उतना ही व्यापक होना चाहिए. सरकारों को जलवायु शिक्षा को मजबूत करना होगा, बच्चों को अनुकूलन योजनाओं में शामिल करना होगा और स्कूलों को जलवायु आपदाओं के प्रति अधिक सक्षम बनाना होगा. विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को जलवायु परिवर्तन को लेकर प्रमाण आधारित अध्ययन जारी रखने होंगे और भविष्य के नेतृत्व को तेजी से बदलती दुनिया के लिए तैयार करना होगा. समुदायों, परिवारों और नागरिकों को यह समझना होगा कि जलवायु से जुड़ा हर फैसला बच्चों के भविष्य से जुड़ा फैसला भी है. भारत के लगभग 40 करोड़ युवाओं द्वारा उठाये गये छोटे-छोटे कदम, बदलाव की ताकत बन सकते हैं. इस विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रश्न यह है कि क्या हम उनकी आवाजों को सुनेंगे और पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करेंगे, क्योंकि बच्चों को दूसरा बचपन नहीं मिलेगा. (ये लेखिका त्रयी के निजी विचार हैं.)

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