Bengal News : वर्ष 1984 में मैंने पत्रकारिता की दुनिया में प्रवेश किया था और 1987 में मैं दिल्ली आ गया. उसके बाद से मैं पश्चिम बंगाल की बांग्ला पत्रकारिता से जुड़ा रहा. लेकिन इस दौरान दिल्ली ही मेरा केंद्र रही. आज इस लेख की शुरुआत अपने अनुभव से जोड़कर इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि 40 साल से अधिक समय बीत गया, लेकिन डबल इंजन सरकार का मतलब क्या होता है, मुझे इसका अनुभव नहीं था. क्यों नहीं था? इसका कारण यह है कि दिल्ली और कोलकाता, दोनों जगह एक ही राजनीतिक दल की सरकार मैंने देखी नहीं. लेकिन ठीक एक महीना पहले पश्चिम बंगाल के चुनाव में भाजपा की जीत के बाद शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में सरकार बनने से देश के संघीय ढांचे में केंद्र और राज्य के वास्तविक आर्थिक सहयोग और विकास का सिलसिला शुरू हुआ है. अखंड भारत की राजनीतिक महिमा क्या होती है, वह अब दिखाई दे रही है.
अभी देश के 15 राज्यों में भाजपा अपने बूते सत्ता में है, जबकि कुल 21 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में वह खुद या गठबंधनों के साथ सत्ता में है. लेकिन पश्चिम बंगाल में भाजपा का सत्ता में आना ऐतिहासिक है. राज्य के पहले मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद्र घोष कुछ दिनों के लिए ही थे. उसके बाद बिधान चंद्र राय मुख्यमंत्री बने. आजादी के बाद जब जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने और बिधान चंद्र राय मुख्यमंत्री थे, तब अखिल भारतीय पार्टी कांग्रेस की केंद्र के साथ-साथ पश्चिम बंगाल में भी सरकार थी. राज्य में सिद्धार्थ शंकर राय आखिरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे और तब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. लेकिन 1977 में जब राज्य में वाम मोर्चे की सरकार बनी, तब से केंद्र और राज्य में एक ही राजनीतिक दल की सरकार कभी रही नहीं.
हालांकि ज्योति बसु के मुख्यमंत्री काल में एक समय केंद्र में वाम मोर्चे के ही सहयोगी गठबंधन की सरकारें रहीं, चाहे वह वीपी सिंह की सरकार रही हो या चंद्रशेखर, देवेगौड़ा या गुजराल की. लेकिन तब भी केंद्र और पश्चिम बंगाल में एक ही राजनीतिक पार्टी की सरकार नहीं थी. पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार को अभी एक महीना हो रहा है, और किसी भी सरकार का मूल्यांकन करने के लिए एक महीने का समय काफी नहीं है. लेकिन लोग मान रहे हैं कि शुभेंदु अधिकारी की सरकार अपनी प्राथमिकता पर फोकस करके जिस तरह काम कर रही है, वह लाजवाब है.
ममता बनर्जी के कार्यकाल के दौरान पिछले 15 साल में भ्रष्टाचार, हर जिले में दादागिरी तथा लुंपेनाइजेशन ऑफ पॉलिटिक्स हुआ है, लगता है, शुभेंदु अधिकारी ने उसके खिलाफ धर्मयुद्ध की घोषणा की है, और इसमें उन्हें दिल्ली की मदद मिल रही है. पंद्रह साल की नकारात्मकता को खत्म कर आम जनता की उम्मीदें पूरी करने का लक्ष्य नयी सरकार के सामने है. पश्चिम बंगाल में विकास सबसे बड़ा मुद्दा है और उस दिशा में काम शुरू हो गया है. एक महीने में ही यह सरकार जितनी प्रोएक्टिव दिख रही है, उस आधार पर इसे 10 में से आठ नंबर इनिशिएटिव फॉर द न्यू बंगाल के लिए देना चाहिए. शुभेंदु सरकार के विकास कार्यों का वास्तविक मूल्यांकन तो पांच साल के बाद ही होगा कि कितना काम हुआ, कितना नहीं हुआ. लेकिन अभी जो जानकारी सामने है, उसके मुताबिक, टाटा, अंबानी और अडानी ने पश्चिम बंगाल में भारी निवेश करने की बात कही है.
इससे पहले पश्चिम बंगाल में बार-बार ट्रेड समिट हुए, लेकिन भारी उद्योग की शुरुआत राज्य में नहीं हो पायी. हालांकि, हेवी इंडस्ट्री आने से ही राज्य की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, ऐसा नहीं है. दरअसल हेवी इंडस्ट्री के साथ-साथ इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ता है, जो एंसिलरी इंडस्ट्री, यानी सहायक उद्योग को जन्म देता है.
मैं यह नहीं कह रहा कि सिर्फ भारी उद्योग ही समाधान है. पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में ट्रेड और लघु उद्योग भी बहुत महत्वपूर्ण साबित होंगे. इस बीच गौतम अडानी के पुत्र करन अडानी की मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात हो चुकी है, और आम जनता इस राज्य के हवाई अड्डों के बेहतर होने का सपना देख रही है. दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद-देश के हर जगह के एयरपोर्ट्स का मॉडर्नाइजेशन हो गया है. सफर के दौरान मुझे कभी-कभी दुख होता है कि पश्चिम बंगाल के एयरपोर्ट्स शायद सबसे खराब हालत में हैं. इस राज्य के हवाई अड्डों के आधुनिकीकरण का एक मौका आया था. तब बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री थे. दरअसल, कोलकाता एयरपोर्ट के अंदर एक मस्जिद थी, और दूसरा रनवे तैयार करने के लिए उसे शिफ्ट करना जरूरी था. तब सैयद शाहनवाज हुसैन केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री थे. उन्होंने खुद बुद्धदेव भट्टाचार्य को कहा था कि आप मस्जिद तुड़वाने का बंदोबस्त कीजिए. मैं मुस्लिम समाज का प्रतिनिधि हूं और मुस्लिम समाज से कोई समस्या नहीं होगी.
लेकिन माकपा को इस पर आपत्ति थी, इस कारण बुद्धदेव भट्टाचार्य इस पर आगे नहीं बढ़े. उसके बाद ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद कुछ सेवाओं का निजीकरण हुआ है. लेकिन ट्रेड यूनियन और सार्वजनिक क्षेत्र वाली सोच के चलते ज्यादा कुछ नहीं हो पाया. अब उम्मीद बनी है कि अडानी जैसे निवेशक अगर पश्चिम बंगाल के हवाई अड्डों का दायित्व लेते हैं, तो बहुत कुछ बदल सकता है. एसइजेड का मुद्दा भी पश्चिम बंगाल में बहुत वर्षों से है. भूमि सुधार के कारण राज्य में जमीन बहुत छोटी हो गयी है. ऐसे में, एसइजेड करना मुश्किल है. गुजरात में एसइजेड का अलग जोन बन गया, कितने निवेशक आ गये और वहां सिंगल विंडो सिस्टम है. मैंने ‘वाइब्रेंट गुजरात’ बहुत साल कवर किया है और देखा है गुजरात में क्या-क्या हुआ और कैसे हुआ है. लेकिन पश्चिम बंगाल में एसइजेड के लिए जमीन नहीं है.
“नहीं चलेगा” पश्चिम बंगाल का बहुत लोकप्रिय नारा है. उसकी जगह ‘चलेगा’ के लिए लोग भाजपा पर भरोसा कर रहे हैं. यह हिंदुत्व का मुद्दा नहीं है. यह विकास का मुद्दा है, जिसे शुभेंदु अधिकारी आगे ले जा सकते हैं. शुरुआत अच्छे से हो रही है और इसके लिए शुभेंदु अधिकारी को बधाई देनी चाहिए. दिल्ली के साथ राज्य का सहयोग बढ़िया चल रहा है. अशोक लाहिड़ी को नीति आयोग का चेयरमैन बनाया गया और मुख्यमंत्री के सलाहकार सुब्रत गुप्ता बेहद काबिल प्रशासक हैं. पीएमओ, अमित शाह के गृह मंत्रालय और मुख्यमंत्री कार्यालय के बीच का सहयोग लाजवाब है और पश्चिम बंगाल में डबल इंजन की सरकार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
