जापान की अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे जटिल मोड़ पर खड़ी है, जहां महंगाई, ब्याज दर, कमजोर येन, भारी सरकारी कर्ज और बूढ़ी होती आबादी- ये सभी चुनौतियां एक-दूसरे से जुड़ती जा रही हैं.
समस्या यह है कि एक चुनौती को नियंत्रित करने की कोशिश दूसरी चुनौती को और गंभीर कर देती है.
यही वजह है कि जापान की मौजूदा आर्थिक स्थिति को सिर्फ एक देश की समस्या मानना सही नहीं होगा.
जापान दुनिया के सबसे बड़े निवेशकों और अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज के प्रमुख विदेशी धारकों में है. इसलिए वहां की मुद्रा, बॉन्ड और ब्याज दरों में बड़ा बदलाव वैश्विक पूंजी प्रवाह को प्रभावित कर सकता है.
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1. कमजोर होता येन: जापान की पहली बड़ी परेशानी
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले जापानी येन में तेज गिरावट देखी गई है.
एक समय डॉलर के मुकाबले येन 160 के स्तर के पार चला गया था. कमजोर मुद्रा का फायदा जापान के निर्यातकों को मिल सकता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू ज्यादा गंभीर है.
जापान ऊर्जा और कई जरूरी वस्तुओं का बड़ा आयातक है. जब येन कमजोर होता है तो जापानी कंपनियों और उपभोक्ताओं को डॉलर में भुगतान किए जाने वाले आयात के लिए ज्यादा येन खर्च करने पड़ते हैं. यानी कमजोर मुद्रा महंगाई का दबाव बढ़ा सकती है.
जापान के लिए मुश्किल यह है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाई जाएं तो आर्थिक गतिविधियों और सरकारी वित्त पर दबाव बढ़ सकता है.
2. ब्याज दर बढ़ाएं या कम रखें, दोनों रास्तों में मुश्किल
जापान लंबे समय तक बेहद कम ब्याज दरों की नीति के लिए जाना जाता रहा है. लेकिन महंगाई बढ़ने पर केंद्रीय बैंक के सामने ब्याज दरों को सामान्य करने का दबाव आता है.
ब्याज दर बढ़ाने से येन को समर्थन मिल सकता है और महंगाई पर नियंत्रण में मदद मिल सकती है. लेकिन जापान पर सरकारी कर्ज का बोझ बहुत बड़ा है. ऐसे में ब्याज दरों में वृद्धि का मतलब सरकार की debt servicing cost में बढ़ोतरी भी है.
यानी जापान के सामने एक कठिन नीति-दुविधा है:
ब्याज दर बढ़ाएं → येन और महंगाई पर नियंत्रण की कोशिश → लेकिन सरकारी कर्ज महंगा.
ब्याज दर कम रखें → कर्ज का बोझ अपेक्षाकृत कम → लेकिन येन पर दबाव और आयातित महंगाई का खतरा.
यही विरोधाभास जापान की मौजूदा आर्थिक समस्या को और जटिल बनाता है.
3. बूढ़ी होती आबादी ने बढ़ाया वेलफेयर का दबाव
जापान की सबसे बड़ी संरचनात्मक समस्याओं में से एक उसकी aging population है.
कामकाजी आबादी का अनुपात घट रहा है, जबकि बुजुर्ग आबादी के लिए पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ता है.
इसका सीधा असर राजकोष पर पड़ता है.
अगर सरकार को सामाजिक सुरक्षा पर ज्यादा खर्च करना है और आर्थिक वृद्धि पर्याप्त तेज नहीं है, तो उसके सामने दो रास्ते बचते हैं- टैक्स बढ़ाना या कर्ज लेना.
कर्ज बढ़ता है तो ब्याज का बोझ बढ़ता है. ब्याज का बोझ बढ़ता है तो सरकार के पास विकास और अन्य सार्वजनिक खर्चों के लिए सीमित संसाधन बचते हैं.
इस तरह demography → welfare spending → borrowing → debt → interest burden का एक चक्र बन जाता है.
4. अमेरिका क्यों चिंतित है?
जापान की समस्या का अंतरराष्ट्रीय असर यहीं से शुरू होता है.
जापान अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज का बड़ा विदेशी धारक है. अगर येन पर लगातार दबाव बना रहता है तो जापानी निवेशकों और संस्थानों के लिए विदेशों में किए गए निवेश को वापस जापान लाने का प्रोत्साहन बढ़ सकता है.
इसे आम तौर पर repatriation of capital कहा जाता है.
अगर बड़े पैमाने पर जापानी निवेशक अमेरिकी परिसंपत्तियां बेचकर पैसा जापान वापस लाते हैं, तो अमेरिकी बॉन्ड बाजार पर दबाव पड़ सकता है. अमेरिकी सरकार को अपने कर्ज के लिए अधिक आकर्षक ब्याज दर देनी पड़ सकती है.
इसका असर सिर्फ अमेरिका और जापान तक सीमित नहीं रहेगा. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए एक महत्वपूर्ण benchmark है. इसलिए अमेरिकी यील्ड में बड़ा बदलाव दुनिया भर में पूंजी की लागत को प्रभावित कर सकता है.
5. ‘Carry Trade’ का उलटा असर
जापान की बेहद कम ब्याज दरों ने वर्षों तक एक खास तरह की वैश्विक निवेश रणनीति को बढ़ावा दिया. निवेशक कम ब्याज पर येन में उधार लेकर दूसरे देशों की ज्यादा रिटर्न वाली परिसंपत्तियों में निवेश करते रहे. इसे yen carry trade कहा जाता है.
लेकिन अगर जापान में ब्याज दरें बढ़ती हैं और येन मजबूत होने लगता है, तो इस रणनीति का आकर्षण कम हो सकता है.
निवेशक विदेशों में अपनी परिसंपत्तियां बेचकर येन में लौट सकते हैं. इससे वैश्विक बाजारों में अचानक liquidity और asset prices पर दबाव बन सकता है.
यही कारण है कि जापान की monetary policy को दुनिया के निवेशक केवल जापानी अर्थव्यवस्था के संदर्भ में नहीं देखते.
6. सबसे बड़ा सवाल: जापान के पास विकल्प क्या हैं?
जापान के सामने मोटे तौर पर तीन लक्ष्य हैं:
- महंगाई नियंत्रित करना,
- येन को स्थिर रखना, और
- आर्थिक वृद्धि बनाए रखना.
समस्या यह है कि तीनों को एक साथ हासिल करना आसान नहीं है.
अगर ब्याज दर बढ़ती है तो येन को समर्थन मिल सकता है, लेकिन सरकार की borrowing cost बढ़ सकती है.
अगर ब्याज दर कम रखी जाती है तो आर्थिक गतिविधि को सहारा मिल सकता है, लेकिन कमजोर येन आयात को महंगा कर सकता है.
और अगर सरकार आर्थिक गतिविधियों को बचाने के लिए भारी राजकोषीय खर्च करती है, तो पहले से ऊंचे कर्ज का दबाव और बढ़ सकता है.
यानी जापान एक ऐसे policy trap में है जिसमें हर समाधान की अपनी कीमत है.
भारत के लिए क्या मायने हैं?
जापान की आर्थिक स्थिति का भारत पर असर कई रास्तों से पड़ सकता है.
- पहला, अगर कमजोर येन लंबे समय तक बना रहता है तो जापानी उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपेक्षाकृत सस्ते हो सकते हैं. इससे जापानी निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ सकती है और भारतीय कंपनियों को कुछ क्षेत्रों में अधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है.
- दूसरा, जापानी निवेश के वैश्विक पुनर्संतुलन का असर उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह पर पड़ सकता है.
- तीसरा, वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बड़ा बदलाव भारत समेत सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की borrowing cost और capital flows को प्रभावित कर सकता है.
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि जापान का संकट सीधे भारत में आर्थिक संकट पैदा करेगा.
प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि जापान की मुद्रा, ब्याज दर और वैश्विक निवेश प्रवाह में बदलाव कितनी तेजी और कितने बड़े पैमाने पर होता है.
