Iran 300 Billion Dollar Fund: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने वाले डॉक्यूमेंट पर साइन हो गए. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस के एवियन-लेस-बैंस में जी7 समिट के बाद इस पर हस्ताक्षर किए, वहीं ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने ईरान में अपने ऑफिस से. यानी इस पर डिजिटल सिग्नेचर किए गए. 14 पॉइंट वाले इस समझौते में अमेरिका के लिए सबसे अहम परमाणु नियंत्रण है. लेकिन ईरान के लिए संभवतः सब कुछ. हालांकि, समझौते में ईरान के लिए सबसे जरूरी प्रावधान है ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए प्रस्तावित 300 बिलियन डॉलर (300 अरब डॉलर) के फंड का. सवाल यह है कि युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई के लिए इतनी बड़ी रकम आखिर आएगी कहां से और इसे देगा कौन?
समझौते में क्या लिखा है?
सीएनएन द्वारा प्रकाशित 14 बिंदुओं वाले मसौदा समझौते के छठे पॉइंट में कहा गया है कि अमेरिका अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर कम से कम 300 अरब डॉलर की एक व्यापक योजना तैयार करेगा, जिसका मकसद ईरान के रिकंस्ट्रक्शन और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना होगा.
दस्तावेज के अनुसार, ‘अमेरिका क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर इस्लामी गणराज्य ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की एक सहमति-आधारित योजना विकसित करेगा.’
समझौते में यह भी कहा गया है कि इस योजना को लागू करने की पूरी व्यवस्था अंतिम समझौते के तहत अगले 60 दिनों के भीतर तय की जाएगी. साथ ही अमेरिका आवश्यक लाइसेंस, छूट और वित्तीय मंजूरियां उपलब्ध कराएगा.
क्या अमेरिका अपनी जेब से देगा पैसा?
अब तक सामने आई जानकारी के अनुसार इसका जवाब है- नहीं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन खबरों को खारिज कर दिया जिनमें दावा किया गया था कि अमेरिका ईरान को सैकड़ों अरब डॉलर देने जा रहा है. ट्रंप ने ऐसी रिपोर्टों को फेक न्यूज बताया. सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने साफ किया है कि यह रकम अमेरिकी करदाताओं के पैसे से नहीं आएगी.
यानी अमेरिकी सरकार सीधे तौर पर 300 अरब डॉलर ईरान को नहीं देने जा रही.
तो ईरान ने जिनको मारा, वहीं देंगे पैसा!
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि यह फंड केवल तभी उपलब्ध होगा जब ईरान समझौते की सभी शर्तों का पालन करेगा. सीबीएस न्यूज से बातचीत में वेंस ने कहा, ‘यह ऐसा फंड है, जिसकी पहुंच ईरान को मिल सकती है, लेकिन इसके लिए उसे अपनी जिम्मेदारियां पूरी करनी होंगी. इस फंड को खाड़ी क्षेत्र के देशों के सहयोग से वित्तपोषित किया जा सकता है.’
यानी वेंस ने यह संकेत दिया कि युद्ध के दौरान जिन खाड़ी देशों को ईरान ने ड्रोन और मिसाइल हमलों से निशाना बनाया था, वही देश भविष्य में ईरान के पुनर्निर्माण में निवेश कर सकते हैं.
उन्होंने कहा, ‘हम इस बात के लिए तैयार हैं कि खाड़ी क्षेत्र के देश ईरान के पुनर्निर्माण में निवेश करें, लेकिन तभी जब ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम समाप्त करे, संवर्धित परमाणु सामग्री का भंडार खत्म करे और ऐसी निरीक्षण व्यवस्था स्वीकार करे जिससे अमेरिका को भरोसा हो जाए कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा.’
फॉक्स न्यूज से बातचीत में वेंस ने और स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘हम नहीं, बल्कि दूसरे देशों को ईरान में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे.’ उन्होंने यह भी कहा कि जब तक ईरान अपना व्यवहार नहीं बदलता, उसे एक पैसा भी नहीं मिलेगा. और उसे अमेरिकी करदाताओं के धन का एक भी डॉलर कभी नहीं मिलेगा. बिल्कुल नहीं.
आधे से ज्यादा फंड पहले ही जुटने का दावा
रॉयटर्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रस्तावित 300 अरब डॉलर के फंड का आधे से अधिक हिस्सा पहले ही कमिट किया जा चुका है. रिपोर्ट के अनुसार, यह कोई सरकारी राहत पैकेज या युद्ध क्षतिपूर्ति योजना नहीं होगी, बल्कि एक निजी निवेश मंच (प्राइवेट इन्वेस्टमेंट व्हीकल) के रूप में काम करेगा. यह नया फंड पुनर्निर्माण अनुदान या सरकारी सहायता कार्यक्रम नहीं है. इसमें किसी भी सरकार का पैसा या अनुदान शामिल नहीं होगा.
रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका, खाड़ी अरब देशों, एशिया, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका की कई कंपनियां इस फंड में निवेश करने की सहमति जता चुकी हैं. बताया गया है कि निवेश मुख्य रूप से ऊर्जा, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण क्षेत्रों में किया जाएगा.
ईरान पहले 400 अरब डॉलर की मांग कर रहा था
रॉयटर्स की रिपोर्ट में एक ईरानी सूत्र के हवाले से कहा गया है कि तेहरान ने शुरुआत में युद्ध से हुए नुकसान के बदले अमेरिका से 400 अरब डॉलर के मुआवजे की मांग की थी. अमेरिका के मना करने के बाद रिकंस्ट्रक्शन और विकास फंड का विचार सामने आया.
ईरानी सूत्र के अनुसार, इस व्यवस्था के तहत क्षेत्रीय देश अलग-अलग तरीके से योगदान दे सकते हैं. इसमें ऋण गारंटी, क्रेडिट लाइन उपलब्ध कराना या युद्ध में क्षतिग्रस्त परियोजनाओं के पुनर्निर्माण के लिए सीधे वित्तीय सहायता देना शामिल हो सकता है. इन परियोजनाओं में ईरान के मुबारकेह स्टील कॉम्प्लेक्स, रिफाइनरी, हवाई अड्डे और युद्ध से प्रभावित अन्य बुनियादी ढांचा शामिल हो सकता है.
प्रतिबंध हटाने की प्रक्रिया से अलग होगा फंड
रिपोर्टों के अनुसार यह निवेश फंड अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने और विदेशों में फंसी फ्रीज की हुई ईरानी संपत्तियों को मुक्त कराने की प्रक्रिया से अलग होगा. यानी एक तरफ प्रतिबंधों और जमे हुए धन पर अलग बातचीत चलेगी, जबकि दूसरी तरफ रिकंस्ट्रक्शन फंड के जरिए निवेश की व्यवस्था विकसित की जाएगी.
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कब बनेगा यह फंड?
फिलहाल यह फंड केवल प्रस्तावित स्तर पर है. समझौते का मसौदा स्पष्ट करता है कि जब तक अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम और बाध्यकारी समझौता नहीं हो जाता, तब तक यह फंड अस्तित्व में नहीं आएगा. यानी अगले 60 दिनों के दौरान फंड के प्रशासक, ईरानी अधिकारियों और संभावित निवेशकों के साथ मिलकर परियोजनाओं की पहचान करेंगे और निवेश की रूपरेखा तैयार करेंगे.
सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी
300 अरब डॉलर के इस फंड ने अमेरिका-ईरान समझौते को नई आर्थिक दिशा दे दी है. लेकिन अभी भी कई सवालों के जवाब आने बाकी हैं. सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या ईरान समझौते की शर्तों को पूरा कर पाएगा और क्या खाड़ी देश तथा वैश्विक निजी निवेशक वास्तव में इतनी बड़ी राशि निवेश करने के लिए तैयार होंगे.
शायद हो जाएं. क्यों? क्योंकि ईरान ने अपनी मिलिट्री माइट से यह दिखा ही दिया है कि मिडिल ईस्ट में वही सिकंदर है. जब चाहे दुनिया को मुश्किल में डाल सकता है (होर्मुज बंद करके) और खाड़ी के देशों को जहां चाहे वहां मार सकता है.
