नदी केवल पानी नहीं होती.
वह किसी शहर के लिए संसाधन हो सकती है...
लेकिन किसी आदिवासी समुदाय के लिए वह जीवन होती है. उसकी भाषा, उसकी पहचान, उसका इतिहास और उसकी आने वाली पीढियां उसी नदी के साथ सांस लेती हैं.
ब्राजील की शिंगू नदी के किनारे रहने वाले युदजा (Yudjá) और अरारा (Arara da Volta Grande) समुदाय आज इसी सवाल से जूझ रहे हैं. उनके सामने चुनौती केवल एक नई सोने की खदान की नहीं है. उन्हें डर है कि अगर यह परियोजना शुरू हुई तो शायद उनकी संस्कृति, उनकी आजीविका और उनकी आने वाली पीढियों का भविष्य भी उसी नदी के साथ खत्म हो जाएगा.
एक नदी, दो परियोजनाएं और बढता संकट
ब्राजील के अमेजन क्षेत्र में बहने वाली शिंगू (Xingu) नदी का एक हिस्सा है वोल्टा ग्रांडे दो शिंगू.
यह इलाका जैव विविधता के साथ साथ कई आदिवासी और नदी किनारे रहने वाले समुदायों का घर है.
लेकिन पिछले एक दशक में यहां पहले बेलो मोंटे जलविद्युत परियोजना बनी. इस बांध ने नदी के प्राकृतिक प्रवाह को काफी हद तक बदल दिया.
अब इसी क्षेत्र में बेलो सन माइनिंग नाम की कनाडाई कंपनी लगभग 22.9 करोड डॉलर के निवेश से देश की सबसे बडी ओपन पिट गोल्ड माइन शुरू करना चाहती है.
यही प्रस्ताव अब विवाद का केंद्र बन गया है.
'हमारी नदी पहले ही बीमार है'
मानवविज्ञानी थाइस मंटोवनेली पिछले एक दशक से इस क्षेत्र के आदिवासी समुदायों के साथ काम कर रही हैं.
उनका कहना है कि शिंगू नदी पहले ही गंभीर संकट में है.
बेलो मोंटे बांध बनने के बाद नदी के प्राकृतिक जल प्रवाह का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा बिजली उत्पादन के लिए मोड दिया गया.
स्थानीय समुदाय इसे एक बेहद सरल उदाहरण से समझाते हैं.
अगर किसी इंसान का दिल केवल 20 प्रतिशत क्षमता से धडकने लगे, तो क्या वह सामान्य जीवन जी पाएगा? आज शिंगू नदी की भी वही स्थिति है.
नदी का यह कमजोर होता प्रवाह केवल पानी की कमी नहीं है.
इससे मछलियां घट रही हैं.
द्वीप सूख रहे हैं.
जंगल बदल रहे हैं.
और उन समुदायों का पूरा जीवन प्रभावित हो रहा है जो सदियों से इसी नदी पर निर्भर हैं.
अब सोने की खदान का डर
समुदायों को आशंका है कि नई खदान से हालात और खराब होंगे.
डर केवल जमीन खोने का नहीं
इस पूरे विवाद का सबसे कम दिखाई देने वाला पहलू मानसिक स्वास्थ्य है.
आज इन समुदायों के सामने हर दिन एक अनिश्चित भविष्य खडा है.
क्या नदी बचेगी?
क्या बच्चे इसी गांव में रह पाएंगे?
क्या मछली पकडना संभव रहेगा?
क्या पीने का पानी सुरक्षित रहेगा?
लगातार बना यह डर लोगों के सामाजिक जीवन और मानसिक स्थिति को प्रभावित कर रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि विकास परियोजनाओं का आकलन केवल आर्थिक लाभ से नहीं किया जा सकता. उनका सामाजिक और मानसिक असर भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है.
क्या लोगों से राय ली गई?
यहीं सबसे बडा कानूनी विवाद है.
ब्राजील ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ के कन्वेंशन 169 को स्वीकार किया है.
इसके अनुसार आदिवासी समुदायों से किसी भी परियोजना से पहले स्वतंत्र, पूर्व और पूरी जानकारी के साथ सहमति लेना जरूरी है.
आरोप है कि बेलो सन परियोजना में यह प्रक्रिया सही तरीके से नहीं अपनाई गई.
समुदायों का कहना है कि उन्हें परियोजना के पूरे प्रभाव, अपशिष्ट बांध, प्रदूषण और खदान बंद होने के बाद की योजना जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां ही नहीं दी गईं.
यानी जिन लोगों की जमीन और जीवन सबसे ज्यादा प्रभावित होगा, उन्हें पूरी तस्वीर कभी दिखाई ही नहीं गई.
महिलाएं बनीं सबसे मजबूत आवाज
विरोध की सबसे सशक्त आवाज इस बार महिलाएं बनी हैं.
मध्य शिंगू क्षेत्र की अलग अलग आदिवासी महिलाओं ने एक साझा अभियान शुरू किया है.
वे एक ही नारा देती हैं.
'बेलो सन अकातो'
यानी 'बेलो सन बाहर जाओ.'
उन्होंने अल्टामिरा, बेलेम और राजधानी ब्रासीलिया तक प्रदर्शन किए हैं.
उनका कहना है कि यह केवल एक खदान का विरोध नहीं है.
यह नदी और आने वाली पीढियों की रक्षा का संघर्ष है.
नदी किनारे रहने वाले परिवार और भी ज्यादा असुरक्षित
इस पूरे विवाद में केवल आदिवासी समुदाय ही नहीं हैं.
सैकडों नदी किनारे रहने वाले गैर आदिवासी परिवार भी प्रभावित होंगे.
इनमें से कई परिवारों के पास जमीन के औपचारिक कागजात तक नहीं हैं.
इस कारण वे कानूनी रूप से और भी कमजोर स्थिति में हैं.
कई परिवारों ने आरोप लगाया है कि परियोजना का विरोध करने पर उन्हें धमकियां मिलीं और कुछ को अपनी जमीन तक छोडनी पडी.
उनका कहना है कि वे पहले ही बांध के कारण नुकसान झेल चुके हैं.
अब नई खदान उनके लिए दूसरी आपदा बन सकती है.
विकास का सवाल आखिर किसके लिए?
बेलो सन का कहना है कि परियोजना रोजगार और आर्थिक विकास लेकर आएगी.
यह तर्क दुनिया भर की अधिकांश बडी खनन परियोजनाओं में दिया जाता है.
लेकिन सवाल यह है कि विकास का लाभ किसे मिलेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा?
अगर रोजगार कुछ वर्षों का हो और उसके बदले नदी, जंगल और पारंपरिक जीवन हमेशा के लिए बदल जाएं, तो क्या इसे संतुलित विकास कहा जा सकता है?
यही सवाल आज ब्राजील में भी पूछा जा रहा है.
दुनिया के लिए भी एक सबक
यह कहानी केवल ब्राजील की नहीं है.
भारत सहित दुनिया के कई देशों में खनन, बांध और बडे बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को लेकर ऐसे ही सवाल उठते रहे हैं.
क्या विकास और पर्यावरण साथ साथ चल सकते हैं?
क्या स्थानीय समुदायों की सहमति वास्तव में ली जाती है?
क्या आर्थिक लाभ सांस्कृतिक नुकसान की भरपाई कर सकता है?
और सबसे महत्वपूर्ण, क्या किसी नदी को केवल संसाधन मान लेना पर्याप्त है?
आखिर में
शिंगू नदी आज केवल पानी का स्रोत नहीं रही. वह दो अलग अलग विकास मॉडलों के बीच खडी है.
एक मॉडल कहता है कि प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग ही प्रगति है.
दूसरा मॉडल कहता है कि जंगल, नदी और वहां रहने वाले समुदाय केवल अर्थव्यवस्था के आंकडे नहीं हैं, बल्कि सभ्यता की साझा विरासत हैं.
संभव है कि आने वाले वर्षों में अदालतें, सरकारें और कंपनियां इस विवाद का कोई कानूनी समाधान निकाल लें. लेकिन एक सवाल शायद तब भी बचा रहेगा.
जब किसी नदी की धडकन धीमी पड जाती है, तो क्या केवल नदी बीमार होती है, या उसके साथ पूरी एक सभ्यता भी धीरे धीरे खत्म होने लगती है?
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