भारत तक पहुंचने के लिए कोई भी विकल्प मंजूर, होर्मुज को बायपास करने के लिए रूस ने बनाया जमीनी प्लान

होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव से समुद्री व्यापार और ऊर्जा की सप्लाई को लेकर दुनिया की चिंता बढ़ी है. रूस भी इससे अछूता नहीं है. ऐसे में मॉस्को अब उन रास्तों की तलाश कर रहा है, जिनसे वह संवेदनशील समुद्री मार्गों पर अपनी निर्भरता कम कर सके और भारत तक अपने व्यापार को जारी रखने के लिए वैकल्पिक नेटवर्क तैयार कर सके.

2022 से शुरू हुए यूक्रेन युद्ध ने रूस के सामने कई मोर्चों पर मुश्किलें खड़ी कीं. वैश्विक अर्थव्यवस्था की आर्थिक नाकेबंदी, तो वह पहले ही झेल रहा था, युद्ध के बाद उसके ऊपर व्यापारिक सैंक्शन भी डाल दिए गए. अब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव ने होर्मुज संकट पैदा कर दिया है. इसने दुनिया के सामने समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े जोखिम बढ़ा दिए हैं. ऐसे हालात में रूस अब ऐसे वैकल्पिक रास्तों की तलाश में जुटा है, जिनके जरिए वह रणनीतिक समुद्री मार्गों पर अपनी निर्भरता कम कर सके.

भारत तक पहुंच रूस के लिए क्यों है इतनी अहम?

रूस के लिए तेल सबसे महत्वपूर्ण निर्यात उत्पादों में से एक है. यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूसी ऊर्जा क्षेत्र पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए. भारत और चीन जैसे बड़े खरीदार भी अमेरिकी और पश्चिमी दबाव के दायरे में आए. चीन के मामले में रूस को भौगोलिक फायदा मिलता है, क्योंकि दोनों देश जमीन से जुड़े हुए हैं. लेकिन भारत तक रूसी सामान और ऊर्जा पहुंचाने के लिए समुद्री मार्ग की भूमिका काफी अहम है.

अब होर्मुज क्षेत्र में तनाव बढ़ने से समुद्री रास्ते की अनिश्चितता रूस के लिए एक नई चुनौती बन गई है. यही वजह है कि मॉस्को भारत तक पहुंचने के लिए जमीन आधारित विकल्पों पर भी विचार कर रहा है. इसी कड़ी में रूस ने हिंद महासागर तक पहुंचने के लिए रेल कनेक्टिविटी विकसित करने की संभावना पर विचार शुरू किया है. 

रूस ने सुझाया भारत तक पहुंचने वाला नया रेल रूट

रूसी उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने कहा है कि भारत तक पहुंच बनाने वाले नए रेल मार्ग की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. खुसनुलिन ने कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य और बॉस्फोरस जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम करने के लिए रूस को हिंद महासागर तक रेल मार्ग बनाने की जरूरत है.

खुसनुलिन की यह टिप्पणी पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध की पृष्ठभूमि में आई है, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है. होर्मुज जलडमरूमध्य एक अहम जलमार्ग है, जिससे सामान्य दिनों में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लगभग पांचवें हिस्से का परिवहन होता है.

खुसनुलिन ने बृहस्पतिवार को रूस की सरकारी समाचार एजेंसी 'तास' से बातचीत में कहा, 'हिंद महासागर तक रेल संपर्क की संभावना भी तलाशी जानी चाहिए. बॉस्फोरस और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के कारण तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होकर गुजरने वाले वैकल्पिक रास्तों की जरूरत पड़ सकती है. भारत तक पहुंच प्रदान करने वाला कोई भी विकल्प स्वीकार्य है.'

ये भी पढ़ें:- ईरान की अमेरिका को धमकी, कहा- सेना पूरी तरह तैयार, हमारी जमीन पर कदम रखा तो देंगे करारा जवाबहोर्मुज और बोस्फोरस क्यों हैं रूस के लिए चिंता?

रूस के इस विचार के पीछे सबसे बड़ी वजह दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर बढ़ता रणनीतिक जोखिम माना जा रहा है.

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है. दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है. किसी भी तरह का सैन्य तनाव या यहां जहाजों की आवाजाही में बाधा आने से तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई प्रभावित हो सकती है.

दूसरी ओर, बोस्फोरस जलडमरूमध्य काला सागर को मरमारा सागर से जोड़ता है. यह रूस के लिए भी महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है, लेकिन इस जलमार्ग पर तुर्की का नियंत्रण है. ऐसे में मॉस्को लंबे समय से अपने व्यापार और परिवहन के लिए वैकल्पिक मार्गों को रणनीतिक महत्व देता रहा है.

पहले भी किया गया है ऐसा प्रयास

रूस, ईरान और भारत के बीच इस तरह की कनेक्टिविटी का प्रयास पहले भी किया गया था. 2020 में तीनों देशों ने मिलकर नॉर्थ साउथ ट्रांजिट कॉरिडोर बनाने की पहल की थी. इसके तहत 7200 किमी का मल्टीमॉडल शिप, रेल और रोड नेटवर्क बनाने की योजना थी. इसमें रूस के सेंट पीटर्सबर्ग से ईरान के बंदर अब्बास और फिर भारत के मुंबई पोर्ट तक आगे बढ़ाया जाता. लेकिन 6 साल भी यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी. अब होर्मुज स्ट्रेट में पैदा हुए नए तरह के संकट ने नई मुश्किल पैदा की है. इसलिए अब रोड नेटवर्क बनाने की योजना पर काम किया जा सकता है.

अमेरिकी टैरिफ की धमकी के बीच आई रूस की टिप्पणी

यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है, जब रूस के ऊर्जा निर्यात को लेकर पश्चिमी देशों का दबाव बढ़ रहा है. अमेरिकी सीनेट ने 29 जुलाई को एक विधेयक आगे बढ़ाया है, जिसके तहत भारत समेत उन देशों पर भारी शुल्क (टैरिफ) लगाने का प्रावधान है, जो रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदना जारी रखते हैं.

ऐसे माहौल में रूस के लिए केवल नए ग्राहक ढूंढना ही पर्याप्त नहीं है. उसे अपने व्यापार के लिए ऐसे परिवहन रास्ते भी चाहिए, जो राजनीतिक तनाव या समुद्री प्रतिबंधों के कारण अचानक बाधित न हों.

ये भी पढ़ें:- बदलता एशिया और भारत की नई कूटनीति -1: कहां चीन, कहां हम?

भारत के लिए भी खुल सकता है नया रास्ता

इस रेल कोरिडोर प्रस्ताव के बड़े भू-राजनीतिक निहितार्थ भी हो सकते हैं, क्योंकि इसके ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होकर गुजरने तथा रूस को हिंद महासागर तक जमीन के रास्ते एक वैकल्पिक संपर्क मार्ग प्रदान करने की संभावना है. 

अगर रूस की यह योजना भविष्य में वास्तविक रेल कॉरिडोर में बदलती है, तो इसका फायदा सिर्फ रूस को ही नहीं, बल्कि भारत को भी मिल सकता है.

रूस को हिंद महासागर क्षेत्र तक पहुंचने के लिए समुद्री रास्तों के अलावा एक वैकल्पिक जमीन आधारित नेटवर्क मिल सकता है. वहीं, भारत के लिए रूस और मध्य एशिया के साथ व्यापारिक कनेक्टिविटी को मजबूत करने का एक नया रास्ता खुल सकता है.

यह कॉरिडोर भविष्य में माल ढुलाई और क्षेत्रीय व्यापार के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन को लेकर देश समुद्री मार्गों के विकल्प तलाश रहे हैं.

लेकिन रास्ते में हैं कई बड़ी चुनौतियां

इस प्रस्ताव को जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा. प्रस्तावित रेल नेटवर्क को कई देशों से होकर गुजरना होगा और हर देश में अलग-अलग इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा, सीमा शुल्क और ट्रांजिट व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

सबसे बड़ी चुनौती अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों से होकर सुरक्षित और निर्बाध रेल कनेक्टिविटी स्थापित करना हो सकती है. इसके अलावा कई देशों के बीच लंबी अवधि के समझौते और बड़े पैमाने पर निवेश की भी जरूरत पड़ेगी.

भारत ने अभी तक इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच पिछले कुछ वर्षों में कई महत्वपूर्ण मुलाकातें हुई हैं, लेकिन इस तरह के किसी नए रेल कॉरिडोर की योजना का सार्वजनिक रूप से पहले उल्लेख नहीं किया गया है.

हालांकि, अगर आने वाले समय में रूस, ईरान, मध्य एशियाई देशों, पाकिस्तान और भारत के बीच इस तरह की कनेक्टिविटी पर सहमति बनती है, तो यह सिर्फ एक रेल लाइन नहीं होगी, बल्कि यूरेशिया और हिंद महासागर के बीच व्यापारिक कनेक्टिविटी का एक बड़ा रणनीतिक बदलाव साबित हो सकती है.

ये भी पढ़ें:- ये कैसा इस्लामिक नाटो? हूतियों ने सऊदी अरब पर किया अटैक, पाकिस्तान और तुर्की चूं तक नहीं कर सके


प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >