भारत छोड़ो आंदोलन -1: जब ब्रिटेन ने द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को झोंक दिया गया, पर आजादी पर चुप रही

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन अचानक पैदा नहीं हुआ था. इसके पीछे कई वर्षों से जमा हो रहा राजनीतिक असंतोष था. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने भारत को बिना भारतीय नेताओं की सहमति के युद्ध में शामिल कर दिया. इसके बाद कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार के बीच भरोसे की आखिरी कड़ियां भी कमजोर होती चली गईं.

भारत छोड़ो आंदोलन को समझने के लिए 1942 से थोड़ा पीछे जाना जरूरी है.

इसकी कहानी सितंबर 1939 से शुरू होती है, जब यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध (Second World War) छिड़ा.

भारत से बिना पूछे युद्ध में शामिल कर दिया गया

सितंबर 1939 में ब्रिटेन ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा की.

इसके तुरंत बाद भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भी घोषणा कर दी कि भारत ब्रिटेन के साथ युद्ध में शामिल है.

फैसला भारत की जनता या उसके निर्वाचित प्रतिनिधियों (elected representatives) से पूछकर नहीं लिया गया था.

कांग्रेस ने इसका कड़ा विरोध किया. 14 सितंबर 1939 को कांग्रेस कार्यसमिति ने कहा कि भारत के लिए युद्ध और शांति का फैसला भारतीयों को खुद करना चाहिए.

कांग्रेस का सवाल सीधा था- अगर ब्रिटेन दुनिया में लोकतंत्र की रक्षा के लिए युद्ध लड़ रहा है, तो वही लोकतांत्रिक अधिकार भारत को क्यों नहीं दिए जा रहे?

कांग्रेस यह भी जानना चाहती थी कि ब्रिटेन के युद्ध के उद्देश्य क्या हैं. क्या युद्ध के बाद भारत को स्वतंत्र राष्ट्र की तरह अपना भविष्य तय करने का अधिकार मिलेगा?

लेकिन ब्रिटिश सरकार की ओर से कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं आया.


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कांग्रेस की प्रांतीय सरकारों ने इस्तीफा दिया

1937 के चुनावों के बाद कांग्रेस ने कई प्रांतों में सरकार बनाई थी. लेकिन युद्ध के मुद्दे पर ब्रिटिश सरकार के रवैये ने टकराव बढ़ा दिया.

जब कांग्रेस को अपने सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो उसके सात प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया. इन प्रांतों का प्रशासन बाद में गवर्नरों के हाथों में चला गया. हालांकि असम की स्थिति अलग रही.

कांग्रेस के इस्तीफे से Muslim League को राजनीतिक अवसर मिला. मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफे के बाद ‘डे ऑफ डिलिवरेंस’ (Day of Deliverance) यानी मुक्ति दिवस मनाया.

उस समय सिंध, पंजाब और बंगाल जैसे कुछ प्रांतों में कांग्रेस के बजाय दूसरी राजनीतिक शक्तियों की सरकारें काम करती रहीं.

इस घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच दूरी को और बढ़ा दिया.

ब्रिटेन का पहला बड़ा आश्वासन: युद्ध के बाद Dominion Status

बढ़ते असंतोष को देखते हुए वायसराय लिनलिथगो (Lord Linlithgow) ने जनवरी 1940 में ब्रिटिश नीति का लक्ष्य बताया.

कहा गया कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को जल्द से जल्द डोमिनियन स्टेटस दिया जाएगा.

डोमिनियन स्टेटस का मतलब था कि भारत को ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर काफी हद तक स्वशासन मिलेगा, लेकिन वह पूरी तरह स्वतंत्र गणराज्य नहीं होगा.

कांग्रेस इस प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं हुई.

उसका तर्क था कि आजादी का सवाल युद्ध खत्म होने तक टाला क्यों जाए? भारतीय नेतृत्व तत्काल और स्पष्ट राजनीतिक अधिकार चाहता था.

यहीं से ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस के बीच अविश्वास और गहरा हुआ.

1940: ‘August Offer’ की घोषणा

फिर आया 8 अगस्त 1940 का दिन.

वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने ब्रिटिश सरकार की ओर से एक नई घोषणा की, जिसे इतिहास में ‘ऑगस्ट ऑफर’ कहा गया.

इसमें कुछ महत्वपूर्ण बातें कही गईं.

ब्रिटिश सरकार ने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के विस्तार और एक युद्ध सलाहकार परिषद बनाने की बात कही. अल्पसंख्यकों के विचारों को महत्व देने का आश्वासन दिया गया.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि भविष्य के संविधान को बनाने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से भारतीयों की होगी.

ब्रिटिश सरकार ने यह भी कहा कि युद्ध खत्म होने के बाद भारतीय जीवन की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप नया संविधान बनाने के लिए प्रतिनिधियों की संस्था गठित की जाएगी.

यानी पहली बार ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट रूप से माना कि भारत के भविष्य के संविधान के निर्माण में भारतीयों की भूमिका होनी चाहिए.

लेकिन इसके साथ कई शर्तें भी थीं.

रक्षा, अल्पसंख्यकों के अधिकार, देशी रियासतों के साथ संधियां और अखिल भारतीय सेवाओं (All India Services) जैसे मुद्दों पर ब्रिटिश सरकार अपने दायित्वों से पीछे हटने को तैयार नहीं थी.

कांग्रेस को क्यों पसंद नहीं आया ऑगस्ट ऑफर?

कांग्रेस के लिए यह प्रस्ताव पर्याप्त नहीं था.

उसकी नजर में ब्रिटेन भारत को वास्तविक सत्ता देने के बजाय भविष्य का वादा कर रहा था.

महात्मा गांधी ने इसे राष्ट्रीय आंदोलन और ब्रिटिश सरकार के बीच दूरी कम करने के बजाय और बढ़ाने वाला कदम माना.

जवाहरलाल नेहरू भी डोमिनियन स्टेटस की अवधारणा से आगे बढ़ चुके थे. उनके लिए भारत का लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता था.

इसलिए कांग्रेस ने ऑगस्ट ऑफर को स्वीकार नहीं किया.

दूसरी ओर मुस्लिम लीग ने प्रस्ताव के एक महत्वपूर्ण हिस्से का स्वागत किया. ब्रिटिश सरकार ने संकेत दिया था कि भारत के भविष्य के संविधान को सभी प्रमुख पक्षों की सहमति के बिना लागू नहीं किया जाएगा.

मुस्लिम लीग ने इसे अपने राजनीतिक हितों के लिए महत्वपूर्ण माना और भारत के विभाजन को भविष्य की संवैधानिक समस्या का समाधान बताना शुरू किया.

इस तरह ऑगस्ट ऑफर भारतीय राजनीति में सहमति बनाने के बजाय मतभेदों को और स्पष्ट करने वाला साबित हुआ.

असली संकट सिर्फ अंग्रेज और कांग्रेस के बीच नहीं था

ब्रिटिश शासन के लिए समस्या केवल कांग्रेस की मांग नहीं थी.

भारत में कई राजनीतिक शक्तियां अपने-अपने भविष्य को लेकर चिंतित थीं. कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता चाहती थी. मुस्लिम लीग अलग राजनीतिक सुरक्षा और आगे चलकर पाकिस्तान की मांग की दिशा में बढ़ रही थी. देशी रियासतों के अपने हित थे.

ब्रिटिश सरकार इसी राजनीतिक विभाजन को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकती थी.

ब्रिटिश भारत के तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एल. एस. एमरी ने भी भारतीय संवैधानिक गतिरोध को केवल ब्रिटेन और भारत के बीच संघर्ष के रूप में देखने से इनकार किया. उनके अनुसार भारत की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों के बीच भी गहरा मतभेद था.

यही वह राजनीतिक पृष्ठभूमि थी जिसमें आगे की घटनाएं विकसित हुईं.


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1942 तक आते-आते भरोसा लगभग खत्म हो चुका था

1939 से 1940 के बीच एक बात लगातार साफ होती जा रही थी-

ब्रिटिश सरकार भारत से युद्ध में सहयोग चाहती थी, लेकिन भारत के राजनीतिक भविष्य पर तत्काल और स्पष्ट फैसला करने को तैयार नहीं थी.

कांग्रेस के लिए यह विरोधाभास अस्वीकार्य था.

एक तरफ ब्रिटेन लोकतंत्र और स्वतंत्रता के नाम पर दुनिया में युद्ध लड़ रहा था, दूसरी तरफ भारत अपने ही भविष्य का फैसला नहीं कर सकता था.

आगे चलकर यह असंतोष और गहरा हुआ.

1942 में क्रिप्स मिशन आया, लेकिन वह भी भारतीय राजनीतिक नेतृत्व को संतुष्ट नहीं कर सका.

इसके बाद कांग्रेस के भीतर यह भावना मजबूत होती गई कि अब केवल बातचीत और प्रस्तावों से काम नहीं चलेगा.

इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में अगस्त 1942 में वह नारा सामने आया, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा बदल दी-

अंग्रेजों भारत छोड़ो.’

और इसके साथ शुरू हुआ वह आंदोलन, जिसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे निर्णायक जन आंदोलनों में गिना जाता है- भारत छोड़ो आंदोलन.

अगले भाग में: क्रिप्स मिशन की विफलता से लेकर ‘करो या मरो’ तक- आखिर गांधी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान क्यों किया?


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लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  4. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  5. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  6. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  7. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  8. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  9. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  10. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  11. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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