यमन के हूती विद्रोहियों के सऊदी अरब पर लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ गया है. इन हमलों में 73 लोग घायल हुए हैं और तेल प्रतिष्ठानों समेत कई अहम ठिकानों को निशाना बनाया गया है. सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद अब सबकी नजर पाकिस्तान पर है. वजह है सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ रक्षा समझौता.
चर्चा ये हो रही है कि अगर सऊदी पर हमले बढ़ते हैं, तो क्या पाकिस्तान सीधे हूतियों के खिलाफ यमन में हमला करेगा?
सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के हमले की वजह क्या है?
- 9 सितंबर को हूतियों ने सऊदी अरब के खमीस मुशैत, अबहा और जिजान शहरों की ओर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन से हमले किए. सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के मुताबिक, हूती लगातार देश के राष्ट्रीय प्रतिष्ठानों और बुनियादी ढांचे को निशाना बना रहे हैं.
- इससे एक दिन पहले हुए हमलों में 73 लोग घायल हुए थे. हमलों में सऊदी अरब के दक्षिणी हिस्से में तेल और ऊर्जा से जुड़े ठिकाने, सैन्य प्रतिष्ठान और एयरबेस भी निशाने पर आए. यानी मामला सिर्फ सीमा पर छोटी-मोटी झड़प का नहीं है. हूतियों के हमले अब सऊदी अरब के अहम आर्थिक और सैन्य ठिकानों तक पहुंच रहे हैं.
हूती सऊदी अरब पर हमला क्यों कर रहे हैं? इसकी चार बड़ी वजहें हैं.
- पहली वजह- पुरानी दुश्मनी
हूती और सऊदी अरब के बीच कई साल से लड़ाई चल रही है. 2015 में सऊदी अरब ने यमन की सरकार के समर्थन में हूतियों के खिलाफ हमला शुरू किया था. तभी से दोनों के बीच तनाव बना हुआ है.
- दूसरी वजह- यमन की सत्ता की लड़ाई
हूती यमन में अपना कब्जा और ताकत बनाए रखना चाहते हैं. वहीं सऊदी अरब यमन की सरकार का साथ देता है. इसी वजह से दोनों आमने-सामने हैं.
- तीसरी वजह- ईरान का साथ
ईरान को हूतियों का बड़ा समर्थक माना जाता है. दूसरी ओर सऊदी अरब और ईरान के बीच मिडिल ईस्ट में लंबे समय से वर्चस्व की लड़ाई चल रही है. इसलिए हूती-सऊदी संघर्ष में ईरान का असर भी दिखाई देता है.
- चौथी वजह- समुद्री रास्ते पर दबाव
हूती लाल सागर और बाब-अल-मंदब के आसपास भी दबाव बनाते हैं. यह दुनिया का एक बेहद जरूरी समुद्री रास्ता है, जहां से तेल और दूसरे सामान से लदे जहाज गुजरते हैं.
ये भी पढ़ें: अमेरिका नहीं चाहता भारत-ईरान की दोस्ती! SCO शिखर सम्मेलन से चाबहार से तक समझिए पूरा मामला
सऊदी अरब और हूती की लड़ाई में पाकिस्तान की भूमिका क्यों अहम है?
- इसका जवाब पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में मिलता है.
- 7 अगस्त 2026 को हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में तीनों देशों ने अपनी सामूहिक सुरक्षा मजबूत करने और किसी सदस्य के सामने आने वाले सुरक्षा खतरों से मिलकर निपटने की बात कही थी. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि यह समझौता रक्षात्मक प्रकृति का है.
- 31 अगस्त को इस्तांबुल में इसी समझौते के तहत तीनों देशों की स्ट्रैटेजिक पॉलिटिकल एंड डिफेंस कमेटी की पहली बैठक भी हुई.
- इसमें सामूहिक रक्षा, सुरक्षा और तनाव कम करने पर मिलकर काम करने की बात दोहराई गई. इसका मतलब हुआ कि पाकिस्तान इस व्यवस्था को सिर्फ कागज पर नहीं छोड़ रहा है.
क्या पाकिस्तान यमन पर हमला करेगा?
- अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि पाकिस्तान सरकार ने अभी यह ऐलान नहीं किया है कि उसकी वायुसेना यमन जाकर हूती ठिकानों पर बम गिराएगी या पाकिस्तान अपनी मिसाइलों से यमन पर हमला करेगा.
- पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने पहले भी साफ किया है कि रक्षा समझौते का मतलब यह नहीं है कि युद्ध होते ही किसी देश के सैनिकों को दूसरे देश की सीमा से बाहर जाकर लड़ना ही होगा. समझौते में प्रशिक्षण, सैन्य अभ्यास और रक्षा सहयोग जैसी चीजें भी शामिल हैं.
- हाल की रॉयटर्स रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान ने ईरान से हूतियों को रोकने की अपील की है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान की संभावित सैन्य मदद का फोकस सऊदी अरब की जमीन की रक्षा तक सीमित रह सकता है.
- हालांकि पाकिस्तान के सामने एक बड़ी परेशानी है ईरान. हूतियों को ईरान का समर्थन हासिल है. ऐसे में अगर पाकिस्तान सीधे यमन में हूती ठिकानों पर हमला करता है, तो उसका सीधा असर ईरान के साथ उसके रिश्तों पर पड़ सकता है.
- पाकिस्तान ईरान को अपना पड़ोसी और महत्वपूर्ण क्षेत्रीय साझेदार मानता है. इसलिए इस्लामाबाद के लिए आसान रास्ता यह होगा कि पहले सऊदी अरब की सुरक्षा में मदद करे, न कि सीधे यमन में युद्ध छेड़ दे.
पाकिस्तान के फाइटर जेट और मिसाइल की क्वालिटी क्यों चेक की जा रही?
- पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा सहयोग को देखते हुए अब यह सवाल उठ रहा है कि जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान अपनी सैन्य ताकत का किस तरह इस्तेमाल कर सकता है.
- पाकिस्तान के पास JF-17 थंडर और F-16 जैसे लड़ाकू विमान हैं. इन विमानों की खासियत यह है कि ये हवा से हवा और हवा से जमीन पर हमला करने वाले हथियार ले जा सकते हैं. ऐसे में उनकी मदद से सऊदी अरब की हवाई सुरक्षा मजबूत की जा सकती है और जरूरत पड़ने पर जमीन पर मौजूद ठिकानों को भी निशाना बनाया जा सकता है.
- हालांकि पाकिस्तान से यमन की दूरी काफी ज्यादा है. इसलिए सीधे पाकिस्तान से उड़कर यमन में हमला करना आसान नहीं होगा. इसमें विमान की मारक दूरी, ईंधन क्षमता, हवा में ईंधन भरने की सुविधा और सऊदी अरब के एयरबेस अहम भूमिका निभाएंगे.
- दूसरी तरफ पाकिस्तान के पास क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों की भी क्षमता है. क्रूज मिसाइल कम ऊंचाई पर उड़ते हुए जमीन पर मौजूद तय लक्ष्यों को निशाना बना सकती हैं, जबकि बैलिस्टिक मिसाइलें बहुत ज्यादा दूरी तक तेजी से पहुंच सकती हैं. हालांकि हर मिसाइल का इस्तेमाल हर तरह के लक्ष्य के लिए नहीं किया जा सकता.
- इसी वजह से विशेषज्ञ पाकिस्तान के जेट और मिसाइलों की रेंज, सटीकता, मारक क्षमता और वास्तविक युद्ध में इस्तेमाल की क्षमता का आकलन कर रहे हैं.
ये भी पढ़ें: Explainer : होर्मुज से लेकर पनामा तक संकट में समुद्री ट्रेड रूट! क्या बदलने वाला है ग्लोबल सप्लाई चेन का गणित
