हिरन का शिकार करना था और बाघ मार बैठे, अब नेपाल के Gen-Z प्रदर्शनकारी अपनी ही सरकार से नाखुश

Nepal Gen Z Activists Not Happy with Government: नेपाल में जेन-जी प्रदर्शकारियों ने सितंबर 2025 में सत्ता का सर्वनाश कर दिया. इसके बाद केपी ओली शर्मा की सरकार गिर गई और सुशीला कार्की नई प्रधानमंत्री बनीं. लेकिन नेपाल के जेन-जी इस नई सरकार से भी नाखुश हैं.

Nepal Gen Z Activists Not Happy with Government: नेपाल की राजधानी काठमांडू में 8 सितंबर 2025 से भड़के हिंसक प्रदर्शनों में अब तक 76 लोगों की जान गई, जबकि 2,300 से अधिक लोग घायल हुए. इन आंदोलनों को ‘जेन-जी आंदोलन’ कहा गया, जिसकी अगुवाई युवा कार्यकर्ताओं ने की. इन्हीं प्रदर्शनों के दबाव में 12 सितंबर को नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशीला कार्की को देश की पहली महिला प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया. कार्की ने इसके बाद मार्च में नए चुनाव कराने का भरोसा दिलाया था. हालांकि, बड़े बदलाव की उम्मीद लेकर सड़कों पर उतरे कई लोग अब अंतरिम सरकार और उसके नेतृत्व से निराश नजर आ रहे हैं.

मुकेश आवस्ती सितंबर में ऑस्ट्रेलिया जाकर सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू करने वाले थे, लेकिन उन्होंने नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं के आंदोलन में शामिल होने का फैसला किया. इस दौरान सुरक्षा बलों की गोली लगने से उनकी एक टांग चली गई. 22 वर्षीय आवस्ती की काठमांडू के नेशनल ट्रॉमा सेंटर में सर्जरी करनी पड़ी. उनका कहना है कि इतने बलिदानों के बाद जो सीमित उपलब्धि मिली है, उसके लिए उन्होंने बहुत बड़ी कीमत चुकाई है, जिसका उन्हें अब पछतावा होता है.

आवस्ती कहते हैं, “अब मुझे विरोध प्रदर्शन में शामिल होने का फैसला गलत लगता है. जिस नई सरकार को हमने बनवाया, उससे अब तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला. भ्रष्टाचार खत्म होना चाहिए था, लेकिन वह आज भी जारी है. जिन लोगों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं, उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए था, पर ऐसा भी नहीं हुआ.”

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उनका कहना है कि सरकार की भ्रष्टाचार-रोधी एजेंसी ने अब तक सिर्फ एक बड़ा मामला दर्ज किया है, जिसमें किसी बड़े राजनीतिक नेता का नाम शामिल नहीं है. जिन नेताओं पर आंदोलन के दौरान भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे, वे अब आगामी चुनावों की तैयारी में जुटे हैं. सितंबर में सत्ता में रहे नेताओं के खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि नई सरकार अपने वादों पर खरी नहीं उतरी. इसी कारण हाल के हफ्तों में दर्जनों लोग उसी सरकार के खिलाफ दोबारा सड़कों पर उतर आए, जो उनके आंदोलन के बाद सत्ता में आई थी. प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर हुए इन प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर किया. प्रदर्शन में दाईं टांग में गंभीर चोट के कारण बैसाखी के सहारे चल रहे सुमन बोहरा कहते हैं, “हम फिर से सड़कों पर इसलिए आए हैं क्योंकि सरकार अपने वादे निभाने में नाकाम रही है. जिन परिवारों ने अपने लोगों को खोया, जो घायल हुए, उनके लिए सरकार ने क्या किया? कुछ भी नहीं. मजबूरी में हमें फिर विरोध करना पड़ रहा है.”

8 सितंबर 2025 को व्यापक भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अवसरों की कमी और खराब शासन के खिलाफ हजारों युवा काठमांडू में जुटे थे. सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंधों से नाराज प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बैरिकेड तोड़कर संसद में घुसने की कोशिश की, जिसके जवाब में सुरक्षा बलों ने गोलियां चला दीं. अगले ही दिन यह आक्रोश पूरे देश में फैल गया. गुस्साई भीड़ ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति कार्यालय, पुलिस थानों और कई शीर्ष नेताओं के घरों को आग के हवाले कर दिया. कई नेताओं को सेना के हेलीकॉप्टरों से सुरक्षित बाहर निकाला गया. 

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हालात काबू में करने के लिए सेना तैनात की गई और बातचीत के बाद सुशीला कार्की को प्रधानमंत्री बनाया गया, जिनकी मुख्य जिम्मेदारी संसदीय चुनाव कराना तय की गई. सरकार का कहना है कि वह इस लक्ष्य के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है. प्रधानमंत्री कार्की ने कहा है, “दुनिया की नजरें पांच मार्च को होने वाली चुनाव प्रक्रिया पर टिकी हैं. मैं आश्वस्त करती हूं कि चुनाव कराए जाएंगे. हमारी तैयारियां लगभग पूरी हैं और सुरक्षा व्यवस्था भी पहले से बेहतर है.”

हालांकि, जेन-जी समूहों के भीतर एकरूपता की कमी भी सामने आ रही है. अलग-अलग समूह अलग-अलग मांगें रख रहे हैं, जिनमें प्रधानमंत्री का प्रत्यक्ष चुनाव, मौजूदा संविधान को खत्म करना और पुराने नेताओं को जेल भेजना शामिल है. न तो आंदोलन का कोई एक नेतृत्व है और न ही कोई संगठित ढांचा. कई लोग खुद को ‘जेन-जी आंदोलन’ का अगुवा बताते हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार, सितंबर के बाद से मांगों में स्पष्टता का अभाव एक बड़ी समस्या बन गया है. काठमांडू के पॉलीगॉन पत्रकारिता एवं जनसंचार महाविद्यालय के प्राचार्य अबीरल थापा कहते हैं, “नेपाल में मौजूदा असमंजस की सबसे बड़ी वजह यही है कि जेन-जी समूह खुद यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे चाहते क्या हैं.” कुछ लोग मार्च में प्रस्तावित चुनावों का विरोध कर रहे हैं, उनका कहना है कि आंदोलन सिर्फ चुनाव कराने के लिए नहीं था, बल्कि भ्रष्टाचार खत्म करने और दोषी नेताओं की तत्काल गिरफ्तारी के लिए था. वहीं, दूसरे समूह मानते हैं कि चुनाव जरूरी हैं ताकि नई संसद आकर ये फैसले ले सके. 

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थापा के मुताबिक, “शुरुआत से ही ये प्रदर्शन बहुत सुनियोजित नहीं थे. ये भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया प्रतिबंधों के खिलाफ शुरू हुए थे. हालात ऐसे बने जैसे कोई हिरन का शिकार करने निकला हो और बाघ मार बैठे हों. सरकार गिर गई और आंदोलन की दिशा बदल गई.” नेपाल में मार्च में चुनाव हो पाएंगे या नहीं, इस पर अब भी संशय है, लेकिन इसके अलावा कोई व्यावहारिक विकल्प भी नहीं दिखता. यह भी साफ नहीं है कि अंतरिम सरकार कितनी मजबूत है. राष्ट्रपति ने सरकार के गठन के समय कहा था कि उसका मुख्य उद्देश्य चुनाव कराना है, लेकिन नेपाल के संविधान में अंतरिम सरकार को लेकर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है. संविधान में केवल यह कहा गया है कि “राष्ट्रपति का प्रमुख कर्तव्य संविधान का पालन और उसकी रक्षा करना है.”

‘जेन-जी’ उस पीढ़ी को कहा जाता है, जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई. यह वही युवा वर्ग है जो तकनीक, इंटरनेट और सोशल मीडिया के साथ बड़ा हुआ है और जिसे ‘डिजिटल नेटिव्स’ भी कहा जाता है. नेपाल में इस पीढ़ी ने बदलाव की लहर तो पैदा की, लेकिन अब आगे की दिशा तय करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है.

पीटीआई-भाषा के इनपुट के साथ.

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