Nepal Flood ग्राउंड जीरो रिपोर्ट : काठमांडू के त्रिभुवन मेडिकल कॉलेज के बाहर मची चीख-पुकार, पोस्टरों में अपनों को तलाश रहे लोग

नेपाल में आई भीषण त्रासदी के बाद लोगों का हाल बेहाल है. काठमांडू के त्रिभुवन मेडिकल कॉलेज के बाहर अपनों की तलाश में भटक रहे लोगों की मार्मिक कहानी दिल दहला रही है. पढ़ें, काठमांडू से प्रभात खबर के रिपोर्टर मनोज गुप्ता की रिपोर्ट.

काठमांडू स्थित त्रिभुवन यूनिवर्सिटी टीचिंग मेडिकल कॉलेज के बाहर का नजारा देखकर किसी का भी कलेजा कांप उठे. शुक्रवार की सुबह से ही अस्पताल परिसर के बाहर सैकड़ों बेबस और हताश लोगों का जमावड़ा लगा हुआ है, जो अपनों की एक खबर पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं.

दीवारों पर टंगी तस्वीरें बनीं एकमात्र उम्मीद

अस्पताल प्रशासन द्वारा परिसर की बाहरी दीवारों पर मृतकों और घायलों की तस्वीरों के पोस्टर लगाये गये हैं. सुबह से ही लोग इन दीवारों के पास अनहोनी की आशंका लिए पोस्टरों को निहारते नजर आ रहे हैं. कोई दीवार पर लगी किसी तस्वीर को देखकर अचानक फफक कर रो पड़ता है, तो कोई धुंधली तस्वीर में अपने भाई, पिता या बच्चे की पहचान करने की कोशिश कर रहा है.


नेपाल बाढ़ :अस्पताल के बाहर पोस्टर्स में अपनों को तलाशते लोग

परिसर के बाहर सन्नाटा और अपनों का इंतजार

अस्पताल के मुख्य द्वार के बाहर खड़े लोगों की आंखें पथरा चुकी हैं. अंदर रखे शवों की शिनाख्त के लिए परिजनों को सीमित संख्या में भेजा जा रहा है, जिससे बाहर खड़े लोगों की बेचैनी हर बीतते मिनट के साथ बढ़ती जा रही है. कई परिवार बीते 24 घंटे से बिना खाए-पीए इसी उम्मीद में गेट के बाहर डटे हैं कि शायद कोई चमत्कार हो जाए और उनका अपना सुरक्षित मिल जाये. आपदा के व्यापक प्रभाव और शवों की स्थिति के कारण शिनाख्त कर पाना प्रशासन के लिए भी बड़ी चुनौती बनी हुआ है. अस्पताल प्रशासन डिजिटल फोटो और कागजी सूचियों के जरिए पहचान प्रक्रिया को गति देने की कोशिश कर रहा है. लेकिन परिजनों की बढ़ती संख्या के आगे व्यवस्था छोटी पड़ती दिख रही है.

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लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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