18 लाख का एक बंदर, डिमांड में तेजी ; जानिए सबकुछ

Monkey Price hike in china : बंदरों को इंसान का पूर्वज कहा जाता है. इन बंदरों की डिमांड पिछले 5 साल में चीन में बहुत ज्यादा हो गई है और इसकी वजह हैं दवा बनाने वाली कंपनियां. चौंकिए मत, बायोटेक के क्षेत्र में अमेरिका की फंडिंग बढ़ने की वजह से बंदरों की ना सिर्फ डिमांड बढ़ी है, बल्कि इनकी कीमत 18 लाख रुपए से भी ज्यादा हो गई है.

Monkey Price hike in china : एक बंदर की कीमत कितनी हो सकती है? क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है? अगर नहीं की है तो जानिए कि चीन में बंदर सोने से भी महंगा बिक रहा है. साउथ चाइना माॅर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार चीन में एक बंदर की कीमत 140,000 युआन यानी $20,260 है. भारतीय रुपए में एक बंदर की कीमत 18 लाख रुपए से भी अधिक है. 

बंदरों की इतनी कीमत की वजह क्या है?

चीन में बंदरों की इतनी कीमत की वजह है कि लैब की किया जा रहा रिसर्च. साउथ चाइना माॅर्निंग पोस्ट के अनुसार पिछले 5 सालों में बंदरों की कीमत दोगुनी हो गई है. सरकारी खरीद के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि किसी भी दवा की गुणवत्ता और वह कितना सुरक्षित है, इसका रिसर्च करने के लिए बंदरों की सख्त आवश्यकता होती है और इसी वजह से चीन में बंदरों की डिमांड काफी बढ़ गई है.

चीन की औसत मजदूरी से भी ज्यादा है बंदर की कीमत

चीन में बंदरों की कीमत में वृद्धि इतनी ज्यादा हो गई है कि यह देश की औसत सालाना मजदूरी से ज्यादा हो गया है. रिपोर्ट के अनुसार चीनी कंपनियों ने कई वैश्विक फार्मा कंपनियों के साथ डील साइन किया है. ऐसे में उन्हें ज्यादा रिसर्च की जरूरत है, ज्यादा रिसर्च होगा तो दवाओं का ट्रायल भी ज्यादा होगा, जिसकी वजह से अधिक से अधिक बंदरों की जरूरत भी होगी. चीन में प्रयोगात्मक दवाओं के लिए भी आवेदन बढ़ गया है और इन वजहों से बंदरों की डिमांड बहुत बढ़ गई है. 

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हर दवा में 70 से 100 बंदरों की जरूरत

अमेरिका में रेट कट से बायोटेक फंडिंग बढ़ी है. यह जानकारी टाइम्स ने US इन्वेस्टमेंट बैंक के हेड कुई के हवाले से यह जानकारी दी है कि कि अधिकतर प्रोजेक्ट शुरुआती स्टेज में जा रहे हैं और उन्हें सेफ्टी असेसमेंट की जरूरत है. इसी वजह से अधिक बंदरों की जरूरत पड़ रही है. किसी रिसर्च में कितने बंदरों की जरूरत होगी यह सबकुछ रिसर्च और उसे करने वाले पर निर्भर करता है. एक अनुमान के अनुसार प्रीक्लिनिकल सेफ्टी स्टडीज में एंटीबॉडी-ड्रग के लिए हर दवा में 70 से 100 बंदरों की जरूरत होती है, जबकि कम रिस्क वाली दवाओं के लिए  40 से 60 बंदर चाहिए होते हैं.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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