PM Modi @ 76: अफगानिस्तान से मध्य पूर्व तक, कैसे बढ़ा भारत का कूटनीतिक कद? मनीष राय का विश्लेषण

PM Modi Birthday 2026: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति ने अफगानिस्तान और मध्य पूर्व में क्या बदला? लेखक मनीष राय ने भारत-अफगानिस्तान संबंधों और बदलते कूटनीतिक प्रभाव का विश्लेषण किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्रPM Modi @ 76: अफगानिस्तान से मध्य पूर्व तक, कैसे बढ़ा भारत का कूटनीतिक कद? मनीष राय का विश्लेषण मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में हुआ था. आज उनके जन्मदिन पर उनकी विदेश नीति को लेकर कई तरह के विश्लेषण सामने आते हैं. लेखक और रणनीतिक मामलों के जानकार मनीष राय का मानना है कि पिछले करीब 12 वर्षों में भारत ने मध्य पूर्व और अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में अपनी कूटनीतिक मौजूदगी को नए तरीके से स्थापित किया है.

उनके अनुसार, इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण भारत-अफगानिस्तान संबंध हैं. अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद अफगानिस्तान के साथ भारत के सामने नई कूटनीतिक चुनौती पैदा हुई. लेकिन राय के मुताबिक, नई दिल्ली ने परिस्थितियों के अनुरूप अपनी रणनीति में बदलाव किया और अफगानिस्तान के लोगों के साथ अपने संपर्क और सहायता कार्यक्रमों को जारी रखा.

तालिबान की वापसी के बाद भारत की रणनीति में क्या बदला?

अगस्त 2021 में तालिबान के काबुल पर नियंत्रण के बाद भारत ने शुरुआती दौर में सतर्क रुख अपनाया. राय के विश्लेषण के अनुसार, इसके बाद भारत ने केवल राजनीतिक सत्ता के साथ संबंधों के बजाय अफगान जनता के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों और मानवीय सहयोग को प्राथमिकता दी.

Taliban Minister Visit

विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अगस्त 2021 के बाद भारत ने अफगानिस्तान को मानवीय सहायता के तौर पर गेहूं, दवाइयां और चिकित्सा सामग्री भेजी। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, भारत ने इस अवधि में 50,000 मीट्रिक टन गेहूं सहित अन्य मानवीय सहायता उपलब्ध कराई.

यही वह क्षेत्र है जहां भारत की नीति को समझने के लिए केवल तालिबान को देखना पर्याप्त नहीं है. अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी का एक बड़ा हिस्सा विकास परियोजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवीय सहायता से जुड़ा रहा है.

अफगानिस्तान में भारत की विकास साझेदारी कितनी बड़ी है?

अफगानिस्तान में भारत की विकास साझेदारी पिछले दो दशकों से अधिक समय से जारी है. संसद भवन, सलमा बांध, जरंज-देलाराम सड़क और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाएं भारत की इस साझेदारी के प्रमुख उदाहरणों में शामिल रही हैं.

तालिबान के सत्ता में आने के बाद भी भारत ने अफगानिस्तान के लोगों को मानवीय सहायता देना जारी रखा. इसका एक उदाहरण संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम के माध्यम से गेहूं की आपूर्ति है. विदेश मंत्रालय के रिकॉर्ड में 2023 तक अफगानिस्तान के लिए 50,000 मीट्रिक टन गेहूं और करीब 250 टन दवाइयों तथा चिकित्सा सामग्री की सहायता दर्ज है.

राय के अनुसार, इस निरंतरता ने अफगान समाज में भारत की उस छवि को बनाए रखने में मदद की, जो केवल सरकारों से नहीं बल्कि लोगों से जुड़े संबंधों पर आधारित है.

2026-27 के बजट में भी अफगानिस्तान के लिए प्रावधान

भारत की अफगानिस्तान नीति केवल मानवीय सहायता तक सीमित नहीं है. केंद्रीय बजट 2026-27 में अफगानिस्तान के लिए 150 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. बजट दस्तावेज में अफगानिस्तान के लिए 2026-27 का बजट अनुमान 150 करोड़ रुपये दर्ज है.

यह प्रावधान ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिति अब भी जटिल है और भारत को सुरक्षा, मानवीय सहायता तथा क्षेत्रीय संपर्क—तीनों आयामों को साथ लेकर चलना पड़ता है.

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2025 में काबुल से दिल्ली तक बढ़े संपर्क

भारत और तालिबान प्रशासन के बीच संपर्क का एक महत्वपूर्ण संकेत 2025 में देखने को मिला.

10 अक्टूबर 2025 को अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी भारत आए. इसके बाद नवंबर 2025 में अफगानिस्तान के उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री अल्हाज नूरुद्दीन अज़ीज ने व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत का दौरा किया. विदेश मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार, अज़ीज की यात्रा 19 से 25 नवंबर 2025 तक हुई थी.

इन संपर्कों का महत्व केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है. अफगानिस्तान के साथ व्यापार, मानवीय सहायता और क्षेत्रीय संपर्क भारत की व्यापक पश्चिम और मध्य एशिया नीति से भी जुड़े हुए हैं.

पाकिस्तान के मुकाबले भारत की अलग रणनीति?

मनीष राय के विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि अफगानिस्तान में भारत की रणनीति को केवल भारत-पाकिस्तान प्रतिस्पर्धा के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए.

उनके अनुसार, भारत के लिए अफगानिस्तान में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा केवल यह नहीं है कि वहां कौन सत्ता में है, बल्कि यह भी है कि भारत के रणनीतिक हित, सुरक्षा चिंताएं और अफगान जनता के साथ उसके पुराने संबंध किस तरह सुरक्षित रखे जाएं.

तालिबान के साथ भारत के संपर्कों को इसी व्यापक रणनीतिक संदर्भ में देखा जा सकता है.

'Neighbourhood First' से आगे, पश्चिम एशिया तक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के अलावा पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र का महत्व भी लगातार बढ़ा है.

भारत के लिए यह क्षेत्र ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश, प्रवासी भारतीयों और समुद्री संपर्क—कई कारणों से महत्वपूर्ण है. इसी वजह से भारत की पश्चिम एशिया नीति अब केवल पारंपरिक कूटनीति तक सीमित नहीं है.

मनीष राय के अनुसार, पिछले एक दशक से अधिक समय में भारत ने खुद को केवल श्रम और मानव संसाधन उपलब्ध कराने वाले देश की छवि से आगे ले जाकर तकनीक, डिजिटल सेवाओं और विकास साझेदारी के क्षेत्र में भी एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में प्रस्तुत किया है.

मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी परीक्षा कहां है?

विदेश नीति की सफलता को केवल यात्राओं या उच्चस्तरीय बैठकों की संख्या से नहीं मापा जा सकता. असली परीक्षा इस बात की होती है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में कोई देश अपने रणनीतिक हितों, आर्थिक प्राथमिकताओं और सुरक्षा चिंताओं को कितनी प्रभावी तरीके से संतुलित करता है.

अफगानिस्तान इसका जटिल उदाहरण है.

Manish Rai

भारत तालिबान सरकार को लेकर अपनी चिंताओं से पूरी तरह मुक्त नहीं है, लेकिन इसके बावजूद उसने अफगान जनता के साथ मानवीय संपर्क और विकास सहयोग को बनाए रखा है. यही संतुलन भारत की वर्तमान अफगान नीति की प्रमुख विशेषता है.

17 सितंबर और विदेश नीति की चर्चा

17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन है. आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, उनका जन्म 17 सितंबर 1950 को वडनगर में हुआ था.

2026 में उनके जन्मदिन के मौके पर उनकी विदेश नीति का मूल्यांकन करते हुए अफगानिस्तान एक उपयोगी केस स्टडी प्रस्तुत करता है. एक तरफ तालिबान के साथ राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी जटिलताएं हैं, दूसरी तरफ अफगान जनता के साथ भारत की पुरानी विकास और मानवीय साझेदारी.

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लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, Geopolitical Analyst, UPSC Educator और 33 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं (जैसे Pratiyogita Darpan) में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. Winning Bengal: Inside West Bengal’s Electoral War of 2026 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  4. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  5. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  6. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  7. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  8. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  9. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  10. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  11. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  12. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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