कभी Israel की सुरक्षा रणनीति का सबसे बड़ा फोकस Iran था. लेकिन अब Turkiye (Turkey) धीरे-धीरे उसकी रणनीतिक गणना में एक अलग तरह की चुनौती के रूप में उभर रहा है.
वजह सिर्फ एर्दोगन की बयानबाजी नहीं, बल्कि तुर्की की सैन्य क्षमता, रक्षा उद्योग, सीरिया में बढ़ता प्रभाव और अफ्रीका-रेड सी तक फैलता रणनीतिक footprint है.
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ईरान जैसा खतरा नहीं, लेकिन ज्यादा जटिल चुनौती
ईरान इजरायल के लिए परिचित खतरा है- मिसाइल, ड्रोन, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रॉक्सी उसका मुख्य सुरक्षा ढांचा रहे हैं.
तुर्की का मामला अलग है.
तुर्की NATO सदस्य, बड़ी पारंपरिक सैन्य शक्ति और तेजी से बढ़ते रक्षा उद्योग वाला देश है. उसके रक्षा निर्यात 2021 के बाद तीन गुना बढ़कर 2025 तक करीब 10 अरब डॉलर पहुंच गए थे और तुर्की लगभग 40 देशों को रक्षा उत्पाद बेच रहा है.
इसलिए इजरायल के नजरिए से सवाल यह नहीं है कि 'क्या तुर्की आज हमला करेगा?'
सवाल यह है कि अगर दोनों देशों की मौजूदा राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता लंबे समय तक बनी रही, तो तुर्की की क्षमता और क्षेत्रीय पहुंच कितनी बड़ी चुनौती बन सकती है?
सीरिया बन गया है पहला बड़ा टेस्ट
बशर अल-असद के दिसंबर 2024 में सत्ता से हटने के बाद सीरिया इस प्रतिस्पर्धा का सबसे संवेदनशील मैदान बन गया है.
तुर्की नई सीरियाई सरकार का प्रमुख समर्थक बनकर उभरा है और सैन्य प्रशिक्षण व सहयोग के जरिए दमिश्क की सुरक्षा क्षमता को मजबूत कर रहा है. दूसरी ओर, इजरायल सीरिया में अपनी सुरक्षा सीमा के नजदीक किसी शक्तिशाली तुर्की सैन्य उपस्थिति को जोखिम के रूप में देखता है.
18 अगस्त 2026 का Abu al-Duhur एयरबेस हमला इसी तनाव का नया संकेत है.
इजरायल ने कहा कि उसने वहां संभावित तुर्की सैनिकों, रडार और एयर-डिफेंस व्यवस्था की आशंका के कारण हमला किया. तुर्की ने कहा कि हमले के समय वहां कोई तुर्की सैन्य प्रतिनिधिमंडल मौजूद नहीं था, जबकि सीरिया ने भी स्थायी तुर्की बेस की योजना से इनकार किया.
अमेरिकी विशेष दूत टॉम बराक ने चेतावनी दी कि यह हमला इजरायल और तुर्की के बीच सीधे सैन्य टकराव का जोखिम पैदा कर सकता था.
यानी सीरिया अब केवल इजरायल-सिरिया या तुर्की-सिरिया का मामला नहीं रहा.
यह इजरायल-तुर्की शक्ति-संतुलन की प्रयोगशाला बन चुका है.
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मामला सीरिया से आगे है
इजरायल की चिंता का दूसरा पहलू तुर्की की multi-theatre presence है.
तुर्की के पास कतर में सैन्य उपस्थिति है, लीबिया में लंबे समय से प्रभाव है और सोमालिया में TURKSOM उसका प्रमुख सैन्य प्रशिक्षण केंद्र है. Brookings के अनुसार, अंकारा की क्षेत्रीय रणनीति अब सीरिया, पूर्वी भूमध्यसागर और Red Sea–Horn of Africa corridor को जोड़ती है.
अफ्रीका में नया मोर्चा
सोमालिया खास तौर पर महत्वपूर्ण है.
तुर्की ने 2017 में Mogadishu में अपना बड़ा विदेशी सैन्य प्रशिक्षण बेस स्थापित किया. इसके बाद उसने सोमाली सुरक्षा बलों को प्रशिक्षित किया और 2024 में समुद्री सुरक्षा और रक्षा सहयोग को और मजबूत किया.
दूसरी ओर, दिसंबर 2025 में इजरायल ने Somaliland को औपचारिक रूप से मान्यता दी. इससे Horn of Africa में तुर्की और इजरायल की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का नया आयाम सामने आया.
यह इलाका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Gulf of Aden–Bab el-Mandeb–Red Sea वैश्विक समुद्री व्यापार का अहम रास्ता है.
इस तरह सीरिया में दोनों की प्रतिस्पर्धा जिस तरह जमीन और हवा में दिखाई देती है, Horn of Africa में वह समुद्री रास्तों, बंदरगाहों, सैन्य सहयोग और राजनीतिक साझेदारियों के रूप में सामने आ रही है.
लीबिया और पूर्वी भूमध्यसागर भी महत्वपूर्ण
तुर्की का लीबिया में प्रभाव भी इजरायल की व्यापक रणनीतिक गणना का हिस्सा बन सकता है.
अंकारा ने पहले पश्चिमी लीबिया की सरकार का समर्थन किया था और अब 2026 में पूर्वी लीबिया के Haftar खेमे के साथ भी सैन्य सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है.
इसके साथ पूर्वी भूमध्यसागर का सवाल जुड़ जाता है- जहां इजरायल, ग्रीस और साइप्रस के बीच सहयोग और तुर्की के समुद्री दावे पहले से रणनीतिक तनाव का हिस्सा हैं.
यानी Ankara की गतिविधियां इजरायल के लिए एक single-front problem नहीं हैं.
Syria + Eastern Mediterranean + Red Sea + Horn of Africa
इन सबको जोड़कर देखने पर तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होती है.
और अब West Asia में एक नया समीकरण
अगस्त 2026 में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने Mecca Joint Defence Agreement पर हस्ताक्षर किए. यह NATO जैसा integrated military alliance नहीं है, लेकिन इससे पश्चिम एशिया में तुर्की की रणनीतिक स्थिति और महत्वपूर्ण हो सकती है.
इजरायल के लिए इसका महत्व इसलिए है क्योंकि यह तीन अलग-अलग क्षमताओं को जोड़ता है:
तुर्की की सैन्य शक्ति + सऊदी अरब की आर्थिक/क्षेत्रीय ताकत + पाकिस्तान की परमाणु क्षमता.
इसे अभी इजरायल-विरोधी सैन्य गठबंधन कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह संकेत जरूर देता है कि West Asia में एक से अधिक शक्ति-केंद्र बन रहे हैं.
क्या तुर्की ईरान से बड़ा खतरा है?
आज नहीं.
ईरान की इजरायल-विरोधी नीति कहीं अधिक स्पष्ट और दशकों पुरानी है.
लेकिन threat perception का अर्थ केवल घोषित दुश्मनी नहीं होता.
इजरायल के लिए तुर्की की चिंता तीन चीजों के मेल से पैदा होती है-
Capability + Geography + Regional Reach
ईरान इजरायल से दूरी पर है और उसका मॉडल मुख्यतः asymmetric warfare पर आधारित रहा है.
तुर्की इजरायल के अपेक्षाकृत करीब है, NATO में है, उसकी अपनी advanced defence industry है और वह सीरिया से लेकर Libya तथा Somalia तक कई रणनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय है.
इसीलिए कुछ विश्लेषकों के लिए तुर्की 'आज का ईरान' नहीं, बल्कि 'कल की संभावित बड़ी चुनौती' है.
