मिडिल ईस्ट में इस मार्च 2026 से शुरू हुई उथल पुथल के बीच नई रणनीतिक साझेदारी सामने आई है. पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए रक्षा समझौते के बाद अब इस गुट में तुर्की भी शामिल हो गया है. ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के हमले और उसके बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद ही यह त्रिपक्षीय समझौता हुआ है. ईरान एक शिया मुल्क है, जबकि तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब प्रमुख सुन्नी देश हैं. ऐसे में क्या है गुट किसी देश के खिलाफ है? इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में यह एक बड़ा सवाल है, जिस पर तुर्किए के विदेश मंत्री ने जवाब दिया है. इसके साथ ही उन्होंने इस इस्लामिक नाटो में एक और देश के शामिल होने की संभावना जताई है.
तुर्किये के विदेश मंत्री ने कहा कि कुछ अन्य देशों ने भी इस समझौते में शामिल होने में रुचि दिखाई है. उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि मिस्र ''अगले चरण'' में इसमें शामिल होगा. उन्होंने मिस्र को एक ''स्वाभाविक साझेदार'' बताया. तुर्किये के विदेश मंत्री ने सऊदी अरब, पाकिस्तान एवं तुर्किये के बीच हुए रक्षा समझौते को क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए कहा कि यह समझौता ईरान या किसी अन्य देश के खिलाफ नहीं है.
मिस्र और इजरायल के बीच यहूदी देश के अस्तित्व में आने के साथ ही संघर्ष शुरू हो गया था. दोनों पड़ोसी देशों के बीच अब तक चार बार युद्ध या युद्ध जैसे हालात बने हैं. सबसे पहली लड़ाई 1948 में अरब-इजरायल युद्ध के दौरान हुई. फिर 1956 में स्वेज नहर संकट पैदा हुआ. इसके बाद सबसे बड़ी लड़ाई 1967 के छह दिवसीय युद्ध में हुई और 1973 का योम किप्पुर युद्ध के दौरान भी दोनों देशों के बीच हालात बिगड़े.
इजरायल इन लड़ाइयों के दौरान मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप पर कब्जा भी कर लिया था. हालांकि, बाद में उसने इजिप्ट की संप्रभुता का सम्मान करते हुए इसे वापस कर दिया. दोनों के बीच 1979 में ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ, जिसके बाद से शांति बनी हुई है.
वहीं इस दौरान भारत और इजिप्ट के बीच दोस्ती ही रही है. दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक-एक के पालक रहे दोनों देशों में प्राचीन समय से संबंध रहे. आधुनिक समय में मिस्र की काहिरा यूनिवर्सिटी से भारतीय इस्लामिक विद्वानों का पुराना नाता रहा है. वहीं भारत की आजादी के बाद पंडित नेहरू के गुटनिरपेक्ष आंदोलन में मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर संस्थापक सदस्य रहे. समय के साथ भारत और इजिप्ट के बीच मधुर ही रहे हैं.
ईरान युद्ध के बाद बदले हुए हालात में यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि क्या मिस्र इस्लामिक नाटो में शामिल होगा? मिस्र भी मुख्य रूप से सुन्नी बहुल देश है. लेकिन क्या वह इजरायल के खिलाफ होगा? अगर सऊदी अरब और ईरान के बीच हालात बिगड़े तो क्या वह ईरान के खिलाफ होगा?
ईरान में युद्ध के कारण क्षेत्र में बढ़ी अनिश्चितता और खतरों के बीच यह समझौता तीनों देशों के बीच सहयोग को मजबूत करने और संभावित हमलों को रोकने की उनकी क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक कदम है. विदेश मंत्री हाकान फिदान ने तुर्किये की सरकारी समाचार एजेंसी 'अनादोलू' को दिए साक्षात्कार में कहा कि तीनों देश किसी भी अन्य देश को तब तक अपना विरोधी नहीं मानते, जब तक वह उनके खिलाफ कोई शत्रुतापूर्ण कार्रवाई नहीं करता.
सऊदी अरब के युवराज (क्राउन प्रिंस) मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने शुक्रवार को मक्का के अल-सफा पैलेस में हुई एक बैठक के दौरान 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' पर हस्ताक्षर किए. समझौते में कहा गया है कि इनमें से किसी एक देश पर हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा.
'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' के तहत तेल संपदा से समृद्ध सऊदी अरब, परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान और तुर्किये एक साथ आए हैं. तुर्किये के पास उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की दूसरी सबसे बड़ी सेना है और उसका रक्षा उद्योग भी तेजी से बढ़ रहा है.
फिदान ने कहा, ''हमारे पास ऐसा कुछ भी लिखित नहीं है और न ही हमने किसी ऐसे दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें किसी साझा खतरे को परिभाषित किया गया हो. जो देश हम पर हमला नहीं करता, वह हमारा निशाना नहीं है.'' तुर्किये के विदेश मंत्री ने कहा कि समझौते में आपसी रक्षा से संबंधित प्रावधान ''तकनीकी रूप से'' नाटो की संधि के आर्टिकल 5 के समान है. इस अनुच्छेद के तहत नाटो के 32 सदस्य देशों में से किसी एक पर हमले को सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है.
यह व्यवस्था कैसे काम करेगी? फिदान ने कहा कि किसी सदस्य देश को मदद के लिए औपचारिक रूप से अनुरोध करना होगा. इसके बाद अन्य दो देश खतरे की प्रकृति के आधार पर खुफिया जानकारी साझा करने एवं रसद सहायता देने से लेकर सैन्य इकाइयों की तैनाती तक कर सकते हैं.
फिदान ने कहा, ''ये बहु स्तरीय मामले हैं और इनका स्वरूप खतरे की गंभीरता के अनुसार अलग-अलग होगा. हमने अब तक अपने काम में इसी दृष्टिकोण को अपनाया है.'' फिदान ने कहा कि समझौते के तहत तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री तथा सेना प्रमुख समिति की बैठकों में नियमित रूप से हिस्सा लेंगे. तीनों देश एक सचिवालय भी स्थापित करेंगे, जिसका मुख्यालय सऊदी अरब में होगा.
